कलम से..
Monday, 16 September 2013
सूरज निकलने को आतुर है
सूरज निकलने को आतुर है ,
धरा से मिलने की मन में आस लिए
कलकल जल बहता स्नेहसिक्त
गुंजित दिशाए कलरव की गुंजार लिए
इन्तजार के पल धडकने लगते है
मन के भीतर नव उजास लिए
लहरे समन्दर की जैसे बुला रही है
धरती तकती राह नयनों में विश्वास लिए .- विजयलक्ष्मी
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment