Tuesday, 31 July 2012

हमसफर है अपना ....



दीपदान करके ही सजाया है धरा को हमने ,

कलम से निकलते है कांटे भी लहू लेकर अपना .

भरोसे पे भरोसा खुदाई से खुदाई औ जुनूं है ,
याद नहीं...जिंदगी हकीकत है या ख्वाब अपना .

मसरूफियत दर्द ए पयाम खुशी दे बैठे हैं ,
क्यूँ वक्त बदलता चला है रंग और सवाल अपना .

डूबता है किनारों के साथ ही रेत दरिया का,
वक्त की ठोकरों से रुका ही कब सफर अपना .

ए जिंदगी सुन ,मालूम है सफर तन्हा नहीं है ,
यादों में ,अहसासों में, बातों में ,हमसफर है अपना.  
                                 .....   विजयलक्ष्मी

जा मत आ इस देस ...लाडो ...


सोचो तो ...
फिर से जीना पडेगा तुम्हारे संग ..
वो ही एक कड़वा सच ..
जिसके साथ मैं भी बडी सब कुछ ..
बदलने की चाह ..
भारी पड़ रही है और फिर वही ..
कुछ नहीं बदला ..
हाँ तरीके बदल गए है दिखावा है
भीतर से नहीं ..
मर जाओ कोख में ही मेरी तुम अब ..
बेटी के लिए ..
नहीं चाहिए ये जिंदगी ये सोच मुझे ..
मत आ दुनिया में ..
संदेश,उपदेश ,सिर्फ ढंग बदले है ..
असलियत भयावह ..
दहेज नहीं स्टेटस चाहिए लड़की का ..
गोरा रंग मानक ..
सावंली मतलब काली ,जैसे गाली दी हों ..
नौकरीशुदा ही हों ..
घर के काम में माहिर, किसी से बात न करे ..
पर व्यवहार कुशल हों..
पढ़ी लिखी होस्टल में किन्तु सीधी हों
धनवान की बेटी हों ..
ख़ूबसूरती भी अभिशाप होगी तुम्हारी ..
ठहरेंगी नजरे पापी तुमपर ..
मत आओ दुनिया में ..जाओ चली जाओ ..
आभी तलक भी ..नहीं बदली ..
शायद कभी न हों पाए अच्छी दुनिया ये ..
सोच वही न बदली है ..
नहीं चाहिए ...दिखती सी आजादी बस ..
मीठे शब्दों के खंजर ..
एक ऐसा नौकर जो सबकुछ सुने और चुप ..
दर्जा बराबर का ही है ..
असलियत तो जीने वाला जाने साथ सदा ..
ईश्वर को कहना --
खुद बन लड़की दुनिया में जी हिम्मत कर ..
तू लौट जा अब भी
मेरी प्यारी राजदुलारी आंसूं मंजूर मुझे मेरे ..
कैसे पियूंगी तेरे आंसूं ..
न कर जिद आने की पछताना न पड़े दोनों को ..
छोड़ दे जिद अब ..
माँ कुलटा नासपीटी कंगले घर की ठीक सही
पर तू क्यूँ बने ..
और लौट जा ....लौट जा ...परदेस वापिस ..
अंग कटेंगे मंजूर ये दर्द ..
ये कुछ वक्त का दर्द न टीसेगा जीवन भर ..

तेरे ही निशाँ मिलते हैं ..



तेरी आँखों में हमे दोनों जहाँ दिखते है ,
तुम जो साथ मेरे हों सफर आसाँ दिखते है


ये मेरी आवाज तुझे ही पुकारे जाती है ,
समझ ले दिल को मेरे हमसाये कहाँ मिलते है


वीरान है दुनिया अपनी तेरे बिन ए दोस्त ,
आईने में भी अक्सर तेरे हीं निशाँ मिलते हैं. - विजयलक्ष्मी 

कैक्टस पर गुल मुश्किल से खिलते है ..


इन्तजार से हर परेशान हाल तक ,

उसूलों की लड़ाई तो लडनी ही है .
मौत के इंतजार से और सहर के उजाले तक ,
जिंदगी कैसे गुजरती है ..मालूम है फिर भी ...
गमले खामोश से हुए है ..
मंजर खो से गए ..
चले आये फिर आंसूं के बादल लेकर मनाने ..
खो जायेंगे किसी जमाने में ..
तरह तो ..
जंगली पौध हौसले से चलती रहती ..
तूफ़ान के सामने से गुजर जाती है और फिर भी इन्तजार ..
गुम होना इस तरह ....समझ लो ??
रुसवाई भी चली आएगी इस तरह तो ..
दामन में ..
भीगते है पूरी रात कायनात खुश्क है मगर ..
सहर के सूरज के बिना ..सहर कहा है सोच कर बताना ..
सहरा में जल कौन देता है असर भी नहीं होता ..
माँ के परसे बिना असमान के बरसे बिना ..
धरा पे रंगत नहीं आती ..मालूम है न ..
सूखा तो कांटे ही देगा ..
गुल सूख जायेंगे ..
कैक्टस पे बहुत मुश्किल से गुल खिलते है ..--विजयलक्ष्मी

ए जिंदगी सुन ,...


दीपदान करके ही सजाया है धरा को हमने ,
कलम से निकलते है कांटे भी लहू लेकर अपना .
भरोसे पे भरोसा खुदाई से खुदाई औ जुनूं है ,
याद नहीं...जिंदगी हकीकत है या ख्वाब अपना . 
मसरूफियत दर्द ए पयाम खुशी दे बैठे हैं ,
क्यूँ वक्त बदलता चला है रंग और सवाल अपना .
डूबता है किनारों के साथ ही रेत दरिया का,
वक्त की ठोकरों से रुका ही कब सफर अपना .
ए जिंदगी सुन ,मालूम है सफर तन्हा नहीं है,
यादों में ,अहसासों में, बातों में ,हमसफर है अपना.विजयलक्ष्मी



कविता गुनगुनायेंगे चलो बैठकर...

शब्द आओ खेलो कलम से 
कविता गुनगुनायेंगे चलो बैठ कर .

दर्द जो बिखरे पड़े है दरों से 
निकल कर, चलें अब उन्हें समेट कर .

आइना सच कैसे बोला ..
छिपा दिया मुझे सूरत तुम्हारी देखकर.

भूल कर कोई भूली हों राह
रख लेंगे उर में समान संग लपेट कर .

ऑंखें खुली रखना मेरी
सफर आखिरी चलें तुम को देख कर. ..
                                                                                                    .विजयलक्ष्मी

Monday, 30 July 2012

जिंदगी दर्द में गुजर रही है ..

बज्म ए सुखन की खुशबू कुछ कह कर गयी है ..
देखो इधर से उनके आने की खबर गुजर रही है ..

मेरी आँख के उजाले चमकते है उसी एक नाम से ..
होंके जुदा उनसे गर्दिशी में जिंदगी गुजर रही है ..

क्यूँ रहम अब खुदा का दिल दुखाया हमने गजब..
हाँ मालूम है खता का जिंदगी दर्द में गुजर रही है ..

वक्त ए सिला अजीब सा , एतबारी न थी उन्हें ..
जलाकर राख कर दिया अब जिंदगी मर रही है ..

परेशां थे वो भी हमसे, हम बेबाक हद कदर थे ..
खतावार भी हम ही थे अब गुजर से गुजर रही है .. -विजयलक्ष्मी

मैं कैक्टस हूँ ...


















.मैं कैक्टस हूँ .....

काँटों के सिवा यहाँ कुछ भी नहीं 
सहरा के समन्दर में गुलों की चाहत 
क्या अजीब ख्वाब औ मंज़र है 
रंग सिर्फ एक ही है दर्द का 
बाकी तो मुखोटे है यहाँ 
ये मुस्कुराहट उधार की लगती है,.. क्यूँ ??
या ये रंग,.... दान है किसी का 
ये जो मैं हूँ ..बस मैं ही हूँ .....
रंगों का असर भला अब क्यूँ कर हो भला
एक चीख दिल को चीर कर
आकाश से गुजरती जमींदोज न हों जाये
तो क्या मज़ा ....???
बोल मत चुप कर ...मैं चुभूंगा ही
रुकना क्यूँ अब ..
जो तेरी समझ कहे समझ ...
मुझसे उम्मीद न कर बदलने की
अमीत मैं ही कैक्टस हूँ ...
वो भी सहरा का ...

Sunday, 29 July 2012

दर्द पत्थरों का सुना क्या ?

















दर्दीले गीत पसंद क्यूँ है झरनों के सभी को ,

पत्थरों पे भी तो निशाँ पड़ते है दर्द उनका भी सुना क्या ?.-विजयलक्ष्मी

ए सितारों ठहर जाना ..


वक्त खो गया है इस कदर
ढूँढना मुश्किल हुआ है अब तो .

मुकद्दस रमजान आया है ,
देखो,ईद को ही आना है अब तो .

कत्ल कर देना जिबह की रात,
गुनाह खत्म हों जायेंगे तब तो .

उतर पडेगी चाँदनी मुकद्दस ,
महक उठेगा चमन औ वतन तब तो.

शिवाला औ रमजान का मिलन
सुन ए आसमान, सम्भल अब तो.

अजब,ए सितारों ठहर जाना ,
दीपावली के दीपों को जलना तब तो - विजयलक्ष्मी

क्यूँ मना कर दिया ?...




तान कर चादर सुला दूँ क्या सहर को फिर से 

आफ्ताब ने निकलने से गर मना कर दिया है ? 
रातों का सफर तन्हा अन्धरें से परेशां है ,
दीप तलक जाने से भी क्यूँ मना कर दिया ?
हैवानियत बढ़ गयी है ,इंसानियत भी नदारत ,
रोशन दिलों को करने से भी क्यूँ मना कर दिया?
कत्ल से परेशां हाल , देख कर दुर्दशा ए वतन, 
सजेगी कैसे जन्नत येबता, क्यूँ मना कर दिया ?
सजदे में बैठा हर शख्स गुम है सदमे में सुन ,
खोया है कहाँ छुपगया ,दिखने से क्यूँ मना कर दिया ?
                                                 ..विजयलक्ष्मी

Saturday, 28 July 2012

क्यूँ मौन हैं ...

जल रहा है देश ,आग लगाने वाले कौन है ?
सन्नाटा पड़ा है गलियों में ,इंकलाबी आज क्यूँ मौन है ?.विजयलक्ष्मी

दास्तान ए अखबार ...

दास्तान ए अखबार --
आज रविवार मतलब बंद ,
सरकारी दफ्तर मौन है ,वैसे भी कौन काम होता है यहाँ खाना पूर्ति ,
घूसखोरी का बाजार चलता है , भ्रष्टाचार ही पलता है ,
मगर अखबार क्यूँ नहीं आया अब तक ??
चिंता सी हों चली है अखबार की क्यूँ ..कुछ गलत कह दिया ?
लोगों का तो शगल है अखबार पढ़ना ..
कुछ फुर्सत से पढते है, कोई चोरी से पढने की ताक में रहता है.
किसी खरीद कर पढ़ने आदत है तो कोई मांगकर पढ़ लेता है..
सहर का अखबार ....
चाय की चुस्की के साथ ,घूमता सबके हाथ..
कुछ सनकी होते है चाय की नहीं जिन्हें अखबार की दरकार होती है ..
आखें चौखट पे टकटकी लगाये चिपकी सी रहती है..
जैसे चैन औ सुकूं कोई उठा कर ले गया हों ..
उफ्फ !कुछ चहलकदमी करते है अखबार के इन्तजार में ,
बचैनी देखते ही बनती है ..
कुछ बे खबर से सोये है ...जैसे चिंता ही नहीं क्या हों रहा ,
आज संडे.... मेल .....देर से पहुंचेगा या
छुट्टी करेगा मेरा अखबार वाला ये भी नहीं मालूम नहीं...
क्यूंकि इन्तजार तो मुझे भी है ..अखबार का हलाकि फुर्सत नहीं होती पर ...
आदत है ..हैडिंग ही मिल जाती पढ़ने को तो सुकूं आ जाता है ..
जैसे जान लौट आई हों ..शरीर में ,
ये अखबार भी ...कितनों का चैन लिए बैठा है ..क्या मालूम ?
मुझे तो अपना पता है बस ...हाँ अखबार तो चाहिए ही .
सोचती हूँ आज अखबार वाले को कह दूँ ,
डांटकर कर ही कहूँगी कि" अखबार क्यूँ नहीं भेजा "-- विजयलक्ष्मी

Friday, 27 July 2012

तकाजा वक्त ए सिला समझ ,राह अब चल दे सम्भल ..

चल ,ए सफर ! तुझे चलना है अकेले ही निकल ,
बदली तो ठहरी है पलक पर बरस लेने दे सम्भल .

वक्त का इन्तजार क्या ,वक्त हुआ है किसका ,
काँटों से भरे सफर है उन्हें भी चुभ लेने दे सम्भल.

क्यूँ परेशां हुआ जाता है समन्दर की लहरों सा ,
सावन के गीत गा, भौरों को भी गुगुनाने दे सम्भल.

राह अपनी गुजर इन्तजार क्यूँकर दुनिया है ,
मजबूरिया औ सीमायें सबकी अपनी रहने दे सम्भल.

चुप रहना कलम का अच्छा कि कम बोले अब.
तकाजा वक्त ए सिला समझ राह अब चल दे सम्भल.

नादानियां अच्छी नहीं होती मालूम है ये भी ,
किया है गुनाह ,दूर मंजिल के सिले चल दे सम्भल .- विजयलक्ष्मी

कौन बडी बात है ...


वक्त के साथ जिंदगी बदलती है ,
दुनिया का बदलना कौन बडी बात है ,

इंसानी फितरत है बदलना खुदा कसम
इंसान का बदलना ही कौन बडी बात है .

मुरझा जाते है गुल ,भौरे गुजर जाते है
तितलियों का मचलना कौन बडी बात है.

नदिया भी समन्दर बन जाती है समझ
पहाड़ों का पिघलना भी कौन बडी बात है.

वक्त हर शैह पर भरी हुआ है सदा से यूँतो
उसपे वक्त का ही बदलना कौन बडी बात है.-- विजयलक्ष्मी

Thursday, 26 July 2012

समाचार समाप्त हुए...



Wednesday, 25 July 2012

नई पौध को रोपने का वक्त आ पहुंचा ...

इन्तजार साँझ का क्यूँ हों बिक चुकी ये शाम ,
नासाज सा वक्त मिलेगा तन्हाई से ..
खो रहे होंगें नजारे सन्नाटे में फिर से ,
गंगा सी जिंदगी बह रही होगी कहीं दूर 
बादल भी घने होते है तिरते है साथ वक्त के 
समन्दर उठता है गहराकर साँझ की बेला का 
वक्त पकडूं क्यूँकर फिसलता चला जाता है
माली को भी चिंता है गुल की, उपवन सहेजना है ..
बगीचे को एक माली की तलाश बाकी है अभी ..
सफर तो यूँ ही चलेगा घोसलें की तलाश है नए
घर के कोने में करीने सजे दो गमले ..
आकार लिया चाहते है अपना अपना ..
नई पौध को रोपने का वक्त आ पंहुचा है ..
सफरनामा तो जरूरी हैं ,
जमीन तलाशनी है ,तलाश जारी है .
खाद पानी का इंतेजामात भी करने होंगे ..
पौध सम्भलकर रोपी जाती है ..
न हों की सूख जाये रोपने से पहले खौफ लगा रहता है ...
कहीं बंजर जमीं में न रोप बैठें गलती से . -- विजयलक्ष्मी

चल थोडा सा मुस्कुरा लेते हैं ..

चल थोडा सा मुस्कुरा लेते है..
सहमना तो लगा ही रहता है जिंदगी के साथ ..
आंसूओं के सिलसिले में भी हंसना जरूरी सा समझ ,
वक्त तो वक्त देगा ही नहीं कभी याद रखना 
छीन लेते है कुछ लम्हे हम भी वक्त के हाथों से .विजयलक्ष्मी

खुदाई नियामत को कोई क्या जानेगा ..

आँख का आंसूं गिरता भी कैसे अटका है गगन के छोर में ,
रूहानियत बात ही अलग है ,खुदाई नियामत कोई क्या जानेगा .
लिख दी पाती सावन बन बरसता है बिजली तूफ़ानी असर देती है ,
सत्य का सत्य होना भी गुनाह झूठ का पर्दा भी कोई क्या तानेगा.
सहर होने को है शिवालय के दीप जलेंगे अब ,शंखनाद होना है ,
बरखा सावन की , सूरज का आगाज दिन उजाला सा,अँधेरा भागेगा .
इंसान बनना ही बाकी है सूरत ए हाल है ,बुत बना डाले हम सरीखे ,
जान डालकर भूल न की ये रहनुमाई ऊपर वाला ही बस अब जानेगा .विजयलक्ष्मी

Tuesday, 24 July 2012

अजब सी कृति तुम उस अनन्ता की ,

नारी क्यूँ बदहाल है यूँ ..
क्या सूर्य निकलना नहीं चाहता तेरी जिंदगी का ..
कही पर अँधेरा गहन, कहीं जल रही है ताप से ,
कहीं पर .... हाथ ताप रही है आग से...
उठाती है नाजायज लाभ कहीं पर ..
सच है कहीं पिस रही है युगों से...
दुश्मन कहीं पर जला खाक कर ने पे अमादा तुझको ..
लहु सी बहती कहीं बर्बरता का बनके ..
कहीं महक पुष्पों की बिखरा रही है...
कहीं समाधि जैसे हों शिव की ..
जैसे गंगा चले , ऐसी बहती सी दिखती ..
है कितने रूप कभी सहरा सी ..
कभी समन्दर सी लगती ...
कभी दर्द पर्वत से सहती चले तू ..
कभी बरसती है बरसात जैसे बहा के चलेगी ..
लगती कभी जैसे सृजक तू है धरा की ..
निर्मात्री सी चलती धरा के हर छोर पर ...
विस्तृत गगन के आगोश मैं जैसे छिप कर ..
खिलती चलें कोई अभिव्यंजना सी ..
अजब सी कृति तुम उस अनन्ता की ,
नाज करूं या करूं शक ओ शुबा समझ से परे तू ...
समझ से परे है ...--विजयलक्ष्मी .

इजहार ए इश्क कयामत न कर दे ...

क्या बयाँ जरूरी है हर बार हलफनामे का ,
समझा करो ,कभी तो चुप भी रह जाया करो .--विजयलक्ष्मी
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न हों , इजहार ए इश्क कयामत कर दे दुनिया में ,
जलजलों का ख्याल रखना भी जरूरी है जिंदगी के लिए .विजयलक्ष्मी
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मन करता है कायनात को दीवाना बना दूँ कदर..
नफरत का नाम ओ निशां ही मिट जाये दुनिया से ,

मगर इंसानी फितरत अजब सा रंग रखती है ..
मुहब्बत में नफरत को ही लिए फिरती है दुनिया में, -- विजयलक्ष्मी

अजब सी कहानी है दोनों दीवाने ...


स्वतंत्रता सेनानी : आजाद हिंद फ़ौज की सेनानी श्रद्धेय लक्ष्मी सहगल जी के निर्वाण और
शहीद चन्द्रशेखर आजाद जी के जन्मदिवस पर शत शत नमन व् श्रद्धासुमन ...
....
आज अजीब सा दिन है ...
एक जिंदगी जा रही है विदा हों जहाँ से ..
दूसरी और जिंदगी के आने का दिन ये मुकर्रर..
अजब सी कहानी है दोनों दीवाने ...
अपने वतन पर जाँ लुटा दे..
लक्ष्मीबाई सरीखी लडती चली वो नाम को नाम फिर से देती चली वो ..
लुटा दी जाँ एक ने गोलियों से ..
वतन पे फ़िदा थे वो आजाद थे परतंत्र देश मैं भी ...
स्वाधीनता जिनकी मंजिल बनी थी ..
लहू के कतरों से जिनके वो दुल्हन सजी थी ,
एक वो चली जाँ आज जवानी जिसने वतन पे लुटा दी ...
आखिरी सांस तक देश सेवा में बिता दी..
एक वो है जिन्हें न फुर्सत हुई दो आंसूं बहा दे..
याद में वतन पे मिटने वालों की चिता ही सजा दे..
न फुर्सत उन्हें देश बेचने से अब भी ..
हौसले है इतने फिर आजादी मिटा दें...
अभी साँस उनकी रुकने न पायी ...
रूहें भी रोती होगीं उनकी देके दुहाई
कैसा अजब ये दिन आज आया ..
शब्दों में बांधूं अब किसका साया ...
दोनों ही दीवाने दोनों मस्ताने ..
देश पे खुद को मिटा कर चले वो ...
उन्हें भावनाओं का शत शत नमन है
कैसे उनके घर?और घर वाले .....
उनका अपना घर से पहले वतन है . --विजयलक्ष्मी
                               
                                                                                               

देश सो रहा है जग जाएगा ...


ऊँची आवाज में बोलना मना है ,
भ्रटाचार के खिलाफ चीखना मना है ,
चुपचाप आकर घूस दो और अपना काम निकलवाओ ..
जोर से बोले तो अनर्थ हों जायेगा ,..देश सो रहा है जग जायेगा ...
अन्ना से कहो अपने घर के दरवाजे बंद कर के बोले ...
खिलाफत करने वालों को कहो,जबान को अंदर गले मैं मोड कर डाल ले
यहाँ शोर करना मना है ..सरकारी बोर्ड टंगा है ....
ऊँची आवाज में बोलना मना है ..
भ्रष्टाचार के खिलाफ चीखना मना है ..
मुझसे रुका नहीं जाता तो ....
सजा पक्की है ...
कलम रोको ,लिखने वालों ..
सड़कों पर उतर कर क्या कर लोगे तू मुट्ठी भर तमाशबीन ...
सरकार को जगाने चले हों या...
खुद को ठिकाने लगाने चले हों ..
क्यूँ देश सो रहा है यहाँ हार्न बजाना भी मना है
ऊँची आवाज में बोलने मना है ..
भ्रष्टाचार के खिलाफ चीखना मना है
देश सो रहा है ...सरकारी लोरी से सो जाओ और
शांत रहकर पिसते जाओ .--विजयलक्ष्मी
 

मेरे पुष्पों को भी अंगीकार कीजिये ..


चन्दन साजिशों पे लगता है ,घाव रिसते रहते है ,
ये कौन है जिसे सकूं पसंद नहीं ,दुखी मन को दुखाता है क्यूँ और ,
सुना था अमन का चाहने वाला भी आग लिए फिरता है ..
ये किसके घर को फूकेंगे ..कोई खबर मिलेगी क्या ,
निकम्मी है पुलिस देखो ,घूस के बाद भी काम वक्त पर नहीं करती,
शहरों की पुलिस नकारा हों चुकी सारी ,अब गाँव की जनता भी नहीं डरती .
जरा वर्दी का लिहाज है ,वर्ना डंडा सबके हाथ है ...पत्थर उठाये सब खड़े है लोग ..
सड़कों पे गुंडाराज है .....हर गली का अपना अपना सरताज है,
कोई किसी को एक नजर नहीं सुहाता ...
सीधी सरल भाषा नहीं कोई जानता ,
पुजारी को भी भक्त वही भाते है ..जो चढावे में अच्छा माल लाते है..
हम पुष्प लिए खड़े रहे दर पे मंदिर के ...
क्या भावों का मोल नहीं ,.......चल तो फिर सोचेंगे हम ...
तेरे भगवान की काहे में तोलेंगे ,क्या तुम बिकाऊ हों गए प्रभु ....
भरोसा नहीं होता बात पर ,मगर तुम्हारा मंदिर यही कहानी बताता है ,
लगता है पुजारी का भी कुछ हिस्सा आता है .
चलो ..उसकी वो जाने ,आये थे हम तो पुष्प चढाने ,
स्वीकर कीजिये ....मेरे पुष्पों को भी अंगीकार कीजिये..--विजयलक्ष्मी .

मानव बनने की फुर्सत किसे है ..

सहर का सूरज बादलों से तो निकल चुका ..
चमक कर आसमां पर खिला तो है ..
बैचैनी का सबब क्या है उसकी ..
धरा का अँधेरा भी मिटने लगा है ..किन्तु सरकारी नीतियां कुछ ऐसी ही है ..
धर्म अंधा होकर बीच में खड़ा रहता है..
सबका धर्म कतई अपना अपना अलग अलग है ..
कुछ का नौकरी कुछ का छोकरी ..
मुहब्बत कुछ का धर्म, झूठ बोलना किसी का ..
किसी नहीं फुर्सत नेता गिरी से ..
कुछ आधे ज्यादा चापलूसों की गिनती..
उनका मानना है नौ काम नौकरी के दसवां "जी हजूरी " ..
न मालूम दुनिया पहुंचनी कहाँ है ...
हर एक घर पे अलग झंडा लगा है ..
जितने मुँह धर्म मुँह बाये खड़े देखतें है ..
इनमे सबके बीच इंसानियत कहीं खो गयी है ..
मानव ,महामानव बनना चाहता है ..
मानव बनने की फुर्सत किसे है ?
सम्वेदनाएँ उसकी कहीं राह मैं गिर गयी है ..
चला जा रहा है अनजान सी डगर पे ..
मंजिल नदारत बस सफर ही सफर है ..
बस सफर ही सफर है ..
जाना कहाँ अब किसे ये खबर है
सहर का सूरज बादलों से निकल तो चुका ..
चमक कर आसमां पर खिला तो है ..
कितने मोड है राह ए सफर में,
न जाने कौन कब किस मोड मुड जाये.
निश्चित कुछ भी नहीं लगता . --विजयलक्ष्मी

सूरज की विदाई तलक ..

इकरार ए सकूं को क्या अब ढोल बजाऊँ बता ..
खुद के भीतर देख हम जिन्दा है कहाँ तलक ..


मेरी मौत की दुआ करना निगहबानी में अपनी ,
कुछ और नहीं कंधें नसीब होंगें कुछ दूर तलक ..

मातम नहीं है यहाँ मगर सन्नाटा तो है देर गए ,
जिन्दा न रहूँ अच्छा होगा,सूरज की विदाई तलक ..

दरकार ए दीदार सहर के साथ होकर खत्म कहाँ है ,
आखिरी साँस के गुजर होते , रह बसर गए तलक..

अंजुमन की ख्वाहिश क्यूँ हों बता आज तू मुझे ,
सत्य है बसर है बस बाकी सुर्य के खिले तलक .--विजयलक्ष्मी

Wednesday, 18 July 2012

मंजिलों के फसलें अभी उम्र से भी ज्यादा हैं ..

नजाकत ,ईमान और इंसानियत भी है ,
जिंदगी की खातिर पूरी रुमानियत भी है ,
नजरें उठकर देखने वालों की खातिर शोला ,
नामुरादों को जलाने की हममे कैफियत भी है .विजयलक्ष्मी

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अब तो सोने वालों को सोचना है ,
सोना है या रुख ए जिंदगी मोडना है ,
बंद कर कानों मैं रुई डाल ले अब वो ,
हमे तो राहों को अपनी ओर मोडना है .विजयलक्ष्मी

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मिट्टी की डगर पे निशां कोई भी बना ले ,
बात तब है कदमों के निशां पत्थरों मैं गड जाएँ .विजयलक्ष्मी .

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जख्मों की सोचेंगे कदम रुक जायेंगे हमारे ..
मंजिलों के फासलें अभी उम्र से भी ज्यादा है ..विजयलक्ष्मी

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अभी कदम उठे ही कहाँ है बस सोचा है ..
कदम उठेंगे तो तूफानों का आना लाजिमी है विजयलक्ष्मी

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डर डर के जी रहे हैं ..

अदब भी है पूरा ,और कायदे को जी रहे हैं ,
फरमान मानते है ,हर ईमान को पी रहे है ,
वहशी हुए कुछ जो उनका हिसाब बाकी है ,
आज भी वतन का दरिन्दें क्यूँ खून पी रहे है .
क्या कमजोर हम हुए या वो ताकतवर हों गए हैं,
क्यूँ अपने ही घर मैं हम, डर डर के जी रहे है.--विजयलक्ष्मी

इजाजत नहीं खनखनाहट की


चूडियों का मतलब कमजोरी नहीं होता ,
पायल की  छम छम भी लुभाती है हमको  ..
दुपट्टा सर पे लेके निकलते है मगर फिर भी ..
मगर कमजोर दिल की ख्वाहिश न की है हमने 
हथौड़े सा बजते है जैसे लुहार के हाथ में ,
धमक उसकी जीकर करके देखी है अपने आप मैं ,
टूटकर वृक्ष गिरता आवाज सूनी है कभी उसकी ....
चीत्कार चीरती है जैसे जूनून को... 
समन्दर के ऊपर खुले से आसमान में झुलसती है 
सहती है दर्द ए बेवफाई सा इजाजत नहीं खनखनाहट की .--विजयलक्ष्मी 

Tuesday, 17 July 2012

भूखी सी भूख भी रहती थी उस घर में ...


भूखी सी भूख भी रहती थी उसी घर में ..रोती थी वो दिन रैन .
छः बच्चों के संग रोगी सी काया रिक्शा का चलता पहिया ..
परवरिश के नाम पर ....सूखी सी रोटी ..
सब्जी पानी का झोल नाम को सब्जी का मोल..
रिक्शा चलकर आया था ..आज शहर में मेला था ..
सोचा था कमाई ज्यादा होगी ...फिर अच्छी वाली रोटी खाने को नसीब होगी ..
पाँच रूपये की सवारी आज सात रुपुए में छोड़ी थी ..
रोज की की कमाई में पचास और जोड़ी थी ...
लखिया ,जो बस नाम की थी ..हाँ शक्लो सूरत से खूबसूरत तो थी
गंदली सी मंगी हुई सलवार कुर्ती में भी जब मुस्काकर लजाती तो चाँद जैसे जमीं पर आ गया
लज्जो को आज कोपी पेन्सिल ,ललिता को चप्पल ..राजू की किताब ...
छत की टीन ....रानी की फीस ..सबका हिसाब लगाया था आज मेला जो था ..
सूरज ढलान पर था ..रमिया थोडा सा खुश भी था ..
आज तो रोज से ज्यादा कमाई हुई ..
दो तीन चक्कर और लगा लूं जल्दी से थोड़ी सी और कमाई ..
अभी तो साथ भी न बजे थे ....रोज का देखा भाला रास्ता था ...
डरने की कोई बात न थी ...फिर चलूँगा घर ...इंतजार मैं होगी लखिया भी ..
सोचता जाता था ..और मुस्कुराता था ...बस दो चक्कर और ..
फिर एक बचा है अब तो दिवाली हों जायेगी ...रुपयों को देख कर मन ही मन खुश था ..
मुस्कुराहट देखते बनती थी रमिया की ...चाचा इस चक्कर के बाद चलता हूँ घर बस ..
कहता हुआ आगे बढ़ गया ..अगले गोल चक्कर से तेजी से चीखने की आवाज आई ..
गाड़ी ने ब्रेक मारा घसीटती चली गयी और ....र..मि...या ..को ...
ल..खी....या.....एक आवाज और सब शांत ....सन्नाटा पसर गया ..सड़क पर
आखिरी चक्कर ,,बन गया आखिरी ही चक्कर ..चाचा की स्न्नातेमे आवाज आई ..
मुस्काती लखिया की तस्वीर धुंधला गयी गयी .... आखिरी सिसकी ...
और छोड़ गयी कई सिसकियां अपने पीछे....
लज्जो की कोपी पेन्सिल ...,ललिता ..की ..चप्पल ...राजू ..की ..किताब ...
खो गयी सब की जिंदगी उस एक मोड पर अन्धेरें में ...
और भूख भूखी सी आज भी उसके बाद भी वही रहती है ..
उस भूख की भूख न मिटी अभी भी ...अब किसका नम्बर ..किसको खायेगी ..
सरकार को क्यूँ नहीं खाती ...नेता के घर भी नहीं जाती ..
गुंडों के घर तो उसका दम घुटता है ...ये भी गरीब के घर में ही पलती है .
इस नासपीटी भूख को भी उसी झोपडी मैं सब कुछ मिलता है ....
दर्द भी और भूख भी, चीखें और मजबूरी भी ..सब कुछ .--विजयलक्ष्मी

यूँ भी दवा नहीं देते ..



गुंचा ए गुल खिल के सदा रंगत नहीं देते ,
बढाते हैं दर्द ही अक्सर,यूँ भी दवा नहीं देते .

मेरे चमन से तो यूँभी बहारों को दुष्मनी है ,
खाया है तरस ही वर्ना कांटे भी नहीं देते .

आग ए नफरत ही सही तुममे मौजूद हम हैं,
सोचो , नफरत को भी वर्ना इजाजत ही नहीं देते.

इस उजड़े चमन मैं क्या है तन्हाई के सिवा ,
जुदा कहाँ वर्ना नजरों की रुसवाई भी नहीं देते.

खामोश निगाहें भी अहसास बढाती दिल का
बादर्द पैगाम ए निगाह वर्ना नाराजगी नहीं देते.-विजयलक्ष्मी
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सन्नाटे में गीतों की स्वरलहरी उठेगी ...



मेघा बरसता ही नहीं सावन सूख रहा है ,
धरा जल रही है कूद में ही भीतर जख्म भर ही नहीं पाते
तपिश जला रही है हिमालय की गोद उजड रही है..
भागरथी निकल कर बहने लगी है सरहद से ..
वक्त सहमकर खड़ा है फिर ..
उड़ जायेंगे बादल ..मानसून की खबर अच्छी नहीं है ..
कुछ दिन तक बरसात न होगी यहाँ ...सूखे के आसार बन रहे है
सुना है कृष्ण की कर्मस्थली यमुना के किनारे बहुत ही खूबसूरती से बसी है ...
क्या बांसुरी आज भी सुनाई देती है वहाँ ...सुन सकेंगे क्या ..
सन्नाटे में गीतों की स्वरलहरी उठेगी ....
असर दूर दूर तलक होगा ...संगीत सुनेगा जो भीतर बजता है
अंतर्मन में बस जायेंगे वो पल तुम भी सुनना ..महसूस करना .विजयलक्ष्मी

Monday, 16 July 2012

यही एक कारण

मेरी व्यथा तो,....मैं ही हूँ ,
मेरा कष्ट ..उतरना फलक से तुम्हारा ,
बेकल सी वीणा विकलता है स्वरों मैं , 
खुद में ही बिखरती हूँ पल पल यही एक कारण ...||

समझ में आता नहीं कुछ...
बिखरा हुआ सा हर एक राग है क्यूँ
टूटके है अम्बर जमीं पे आ गया है....
बहती हूँ उन्ही आंसूंओं मैं संग संग यही एक कारण ...||

विरक्ति पुकारे क्यूँ ...
समा जाये धरती कहाँ बिन गगन के ,
छाया है ऐसे सावन का घनघोर बादल ,
बिखरता है मन चटक चटक कर यही एक कारण ...||

रूह का रूह मैं अहसास है कुछ ...
सहर का उजाला सूर्यकिरण बिन होता कहाँ है
स्वप्निल सी दुनिया , नूर किसका समाया है ,
था फलक पे बैठाना ,क्यूँ नीचे उतारा यही एक कारण ...||

इंसान हूँ ,इंसानियत भी है इतनी ...
संताप ने तोडा , पत्थर हूँ अहसास हुआ जब
खुशियों के बदले ,दुःख और कांटे है बांटे क्यूँ हमने
न समझे हों तुम ही ,कोई समझेगा कैसे यही एक कारण ...||विजयलक्ष्मी

Sunday, 15 July 2012

आज की सत्य कथाएँ















बस गाँधी जी के तीन बंदर ..

न देखो, सुनकर फिर बोलना क्यूँ , 
गुण चाहिए सब बस एक के अंदर ,
ओह ..राज शब्द कुछ अजब सा हुआ था 
पिता की नजर ...क्यूँ घबरा गयी बेटी ..
भाई के हाथ वो दुपट्टा था किसका ..
माँ ने भी रोटी उसी की खतिर धरी थी ,
शंशय की दुनिया बहुत ही अजब है..
चुभती सी नजरें नोंचती सी शरीर ,
पड़ने लगी पत्थर पे लकीरें ...
शक की बेल ..रूकती नहीं है कभी भी ..
ज्वालामुखी की दरारें न भरती ..
अंगूर बोने से खेती लाजवाब होती ..
जिंदगी का देखना पक्का हिसाब है..
खौफ क्यूँ ,अविश्वास की कच्ची होती ताब है ,
सहमे से चेहरे सबके ही भीतर समाये ..
डस न सके कोई ,....थे खंजर उठाये ,
झाँसी की लक्ष्मी बाई ..देखना मेरी ही बेटी न बन जाये ,
जरूरी है मगर जमीं पे वो आये ..
स्वार्थ की जमीं को खादपानी क्यूँ सुहाए ...
भाई के खून से रंगे है हाथ ,चलता देता कंधा साथ ,
हर कोई घात बैठा है घात लगाये ...चलें बहुत बात हों गयी ...
किस्सा नहीं है आज की ये सत्यकथाएं .--विजयलक्ष्मी .

Wednesday, 11 July 2012

मारने से पहले ....

क्या करे गुलामी की आदत
लगता है पुरानी है हिन्दुस्तान मैं 
पहले मुगलों की मर झेली 
फिर अंग्रेज चले आये ...
अब घर के लोग ही शमशीर दिखा रहेहैं 
मारने से पहले आजकल बताता भी कौन है .-विजयलक्ष्मी

सरकार सोच में तो नहीं ...

हर शब्द मुखबिरी कर रहा है यहाँ 
हाजिरी की कमी के चलते सजा की दरयाफ्त ,
सुकून ए अदालत को सजा मुकर्रर क्या की जाती है ,
शहंशाही फरमान सुनाया जाय ....
या तब्दीली अभी बकाया है कोई ?
क्या इन्साफ की तौहीन तो न होगी ये ....
आवाम का फैसला क्या होगा उसके बाद ....
सरकार सोच मैं तो नहीं ....किसे गद्दी दी जाये और .......?-विजयलक्ष्मी

जिंदगी मुलिसी मैं चल रही है ...

जिंदगी मुफलिसी में चल रही है 
छप्पर मेरे घर का आधा उजड़ा सा है 
आधे से ज्यादा तो ब्याज मैं चुकता होती है ध्याडी दिनभर की 
अमावस की रात सा उजाला तो बदली मैं छिप गया.....
देखता है बारिश का रुख आज भी ,
भरोसा हों भी क्यूँकर ...सरकारी मुलाजिम जो ठहरे ,
वक्त की पाबंदियां है यहाँ और स्वरोजगारी इच्छाधारी है ...
वेदना ,सोच रहे है अंतर्मन के अंधकूप मैं डाल दूँ तुम्हे ...
फिर कोई न बांच सकेगा ...नयन तुम बरसते क्यूँ हों ..
अभी बादल हैं अम्बर पर ...शांत तो नहीं लगते,
बिजली कडकती है रुक रुक कर ..सहर तक जिन्दा रहे तो ....
आफ़ताब से रूबरू होंगे, रूह के शहर सन्नाटा क्यूँ है पसरा .-- विजयलक्ष्मी