Wednesday, 29 August 2012

वफा को मौत से गुजरना होगा .....




















दीवानों का जनाजा निकलेगा शहर में नहीं,

दुनिया में मातम होगा ....
फूल दुश्मन भी न बरसाए गर अर्थी पर भला 
कैसे ये चाँद पूर्णम होगा ....
चीखों से अभी तेरे घर को भरा ही कहाँ है 

दर्द तेरे साथ लिपटा होगा ...
वो खला तुम ही हों न जिसने जाल फेंका था
भुनगा सा ही जलना होगा ....
किसी तौर तडप न छोड़ेगी किसी को अब देखो
वफ़ा को मौत से गुजरना होगा ....
बहुत जिया शब्दों में शातिर चलों सा पहले भी
उन गलियों से फिर गुजरना होगा ....
तूफानों का अब असर देख जो छेड़े थे तुमने कभी
सबको दीवाने के साथ ही मरना होगा .... -- विजयलक्ष्मी

सूरज भी रंग बदल रहा है ...


शब्दों का काफिला निगाह में
नीलामी की गाय ,दर का वफादार कुत्ता ..बैठा है उम्मीद में ..
मेरे कच्चे घर की छत .. उड़ जाती है तूफ़ान में ..
क्या सरकार को इसकी चिंता बाकी है ..
या सरकार बहरी हों चुकी आज और बहने दे ...बाढ़ में जैसे गंगा ने बहा दिया ..
बाँध न बंधेगा ..कितनी बार नापतौल बाकी करेगी सरकार ...
या बिलकुल निकम्मी है पर इतनी उम्मीद नहीं थी ..
क्या कह सकते है घोटालों का परचम लहराया है हर ओर ..
और उस पर मिजाज भी कुछ बदले से है आज सरकार के ..
सुना है कसाब को फांसी हों ही जायेगी ..
चलो मुसलमानों को ...हाँ वही जो चुप बैठे है सजा मिलने से सबक मिलेगा ..
शायद समझ जाये कि जनता ने किस से उम्मीद लगाई ..
चुप्पी ..बता रही है कि समन्दर का उफान देख ...
किसी दरख्त के नीचे पनाह लेली ...और बारिश का आनंद लिया जा रहा है ..
उम्मीद तो नहीं दोस्तों से ऐसी पर बदलता वक्त क्या पता ?
आज ....सूरज भी रंग बदल रहा है ...
न मालूम धरती का क्या हश्र होने वाला है ..
उसपर राम भजन का चिप्पा ...चस्पा दिया हैं .-- विजयलक्ष्मी

फटे हाल किसान ..



अन्नदाता हमारा भगवान ,आज भूखा ही रहा ,
सरकार की नजर भी न पडती है उसपर ..
उसकी औकात ही क्या है 
सत्य मरते भी सत्य ही रहेगा..
आज का वक्त सच में ..
फटे हाल किसान .....
मौसम की मार कर्ज की मार ....गिरवी पड़े खेत ...
उसपर नागरिकों की अनदेखी
कृषक को किसी भी तरह से लाभ से दूर रखती है
उसका साथ तो मानवाधिकार भी नहीं देता ..
वो भी अपने मतलब की बात करता है ...
और सरकार के तो कहने भी क्या ...माशाल्लाह ,
मतलब खत्म तो ...बाहर का रास्ता दिखा दो .....
आज लोगो का जमीर यही है शायद ...
सच तो मर ही रहा है ...
यही आखिरी सत्य होगा शायद ..
हों भी सकता है 
क्या सीरत और सूरत वाह ....बहुत खूब
 -- विजयलक्ष्मी

हे प्रभु !सत्य टूटने लगा है क्यूँ ?




* हे प्रभो !सत्य टूटने लगा है क्यूँ ?

तल्खी और दर्द तो सही था मगर डूबने लगा है क्यूँ ?
अब तो सुन ले एक प्रार्थना मेरी ....
मेरा खुदा मुझसे रूठ गया और तू भी छूट सा गया क्यूँ ?
दर पे तेरे आया हूँ ---मुझे मौत की दरकार है...
जमाने में गुजर ही 
नहीं मेरा अब ....

मुझे सच्चाई से दूर झूठ की ओर ले चलो |

आजकल इसी का बोलबाला है |
इसके बिना गुज़ारा नहीं इस दुनिया में |-विजयलक्ष्मी 
                                                    ..सहयोग भावेश शर्मा जी 

Tuesday, 28 August 2012

पत्थर के भगवान ...

 

नदियाँ आकर उड़ेल जाती है मिठास अंतर्मन की सारी ,


फिर क्यूँ हों जाते हों खारे खारे ,


समन्दर क्यूँ नहीं हों जाता मीठा ,सोचा है तो ..बतलाना मुझको 

आग पर तप कर निखरे क्यूँ सोना ,दमके कंचन बनके ...

नयनों के आंसूं धो जाते है मन दर्पण को .....


दर्द बना क्यूँ चौकीदार तुम्हारे घर का ,,,


छोड़ कर सबकुछ दर्द भूल जाओ गर कर पाओ ...इस दौर में ...


मुश्किल है ,....कहना भी मुश्किल है फिर भी सहता हर कोई ...


मरे तो सभी 

मगर क्या ...

कुछ जन्नत को प्यारे ,

कुछ को यम मार कर भी दर्शन नहीं देते ..

मत पूजो इतना कि पत्थर होना मजबूरी हों जाये ..

क्यूंकि मंदिरों में पत्थर के भगवान .....

और श्रद्धा का दीप सदा ही जलता रहता है ...


और मौन तारी रहता है ,....बोलता है बस सन्नाटा ...--विजयलक्ष्मी





जीवन का प्रभात ,,




अकेला खुद में ..



हर शब्द सन्नाटे में तारी है जैसे मौत से मिल गया हों ,
चीखने की चाहत चिल्ला चिल्ला कर,शांत है खुद में .
इस मेले में भी अकेलापन वो भी इसकदर बस गया ,
जैसे गुल कोई गुंचा भी हों , एक अकेला भी खुद में .- विजयलक्ष्मी.

Tuesday, 21 August 2012

कश्ती से भेंट जाता है ..





निकहत ए गुल गुलशन की आकर देख जाता है ,
कभी नदिया कभी अम्बर, कश्ती से भेंट जाता है .

सुरों के बीच आकर भी गुनगुनाना भूल जाता है ,
मौसम सर्द हों कितना ,पतझड सा छेड जाता है .

पहाड़ी झरने सा गिरकर ,नदी सा गहर जाता है ,
थर्राता है समन्दर सा,और चातक सा टेर जाता है .

जमीं जंगल की, मुहर खेत की सरकारी चाहता है ,
 उठाना चाहता तुफाँ ,खुद ख्वाबों को बेच आता है.

पैमाइश ए जमीं ,क्यूँ उसपे अश्कों को गिराता है,
तपिश सूरज,तमन्ना चाँद,पौधों को देख जाता है.

- विजयलक्ष्मी

Monday, 20 August 2012

ओम् में ही सब बसे ...



रमजान में राम है.. दिवाली में अली ,
जाने वन्देमातरम के नाम पर तोप क्यूँ चली ?

जय राम जी की ,कहने में जुबां नहीं घिसती ,
या खुदा ,तेरे बंदे है सभी फिर क्यूँ इतनी खलबली ?

नाम ए वफ़ा चाहिए बस और की दरकार क्या ,
ओम् में ही सब बसे ,ओम् से ही दुनिया चली .
-विजयलक्ष्मी

काश !!



काश हम भी आजादी के सिपाही बन जाते ,
हिंदू मुसलमां से पहले इंसान बन जाते .

ये किस्से जो लहू से लिखे जा है आज तक ,
इंसानी मुहब्बत के जज्बों से लिखे जाते .

न रोती इंसानियत खड़ी चौराहों पे इस कदर ,
न लाशों को किसी की काँधे ढो रोते हुए जाते .

गीत वतन में होते अमन ओ चैन के मेरे ,
खुशियों को हम भी आपस में बाँट पाते .

जय राम जी की कह ,वन्दे मातरम दिलों में ,
गणपति बप्पा के साथ ,ईद मुबारक कह जाते .
-- विजयलक्ष्मी

समझ लेना ...



बेगैरत ,बेमकसद ,बेवफा, नामाकूल सा ...
पुजते रहे मगर पत्थर से ज्यादा कुछ भी न हुआ ,..
कद्रदान जब तुझे फेंक दे उठाकर बेपीर सा ,समझ लेना
वो"खुदा " हों गया दुनिया में सबका और " तू कामयाब " .
- विजयलक्ष्मी

अजब सी सहर है न आज ..


ये चुप्पी सालने लगी है अब ...
आवाज को कान तरसने लगे है और हम ..
चौखट कर उस ओर की आहट को पहचानने भी लगे है ,
जानते हों तुम इस सच को ..
ये आंगन ,.....खेलते खेलते संजीदगी हों आई है अब ..
और सन्नाटा पसरने लगा है ...
चीखता है कानों के भीतर फिर भी बदस्तूर जारी है ..
कदम उठते उठते भी रुकते से है क्यूँ ?
परीक्षा किसी की नहीं ,खुद की ही है ये ..फरिश्ते जिद कर जाते है ..
माननी पडती है बात और फिर अखबार छप गया ..
मुझे नहीं मिला आज भी पढ़ने को ..
कहाँ चला जाता है ये अखबार इतनी छुट्टी ..?
नहीं सुनता मनमौजी सा हों गया है ..
ख्वाब सा देखता है ...ख्वाब देखना चाहिए जिंदगी के लिए जरूरी है ..
उन्वान न हों तो कदम राह से भटकने का दर भी रहता है
उन्वान ...नहीं इहलाम ...जो झंकृत करते है वीणा के सुरों को
और सज जाते है ख़ूबसूरती से चहुँ ओर ..
अजब सी सहर है न आज ...
जैसे बहुत जल्दी चली आई हों ..
और दिन ..कटते कटते कट जाता है ..
जिंदगी भी साँझ की ओर उन्मुख हुआ चाहती है ..
सदमे में क्यूँ हों ..मुस्कुराहट खोने मत दो अपनी ..
माँ को बुरा लगता है और
वो बूढा बरगद हंसते चेहरे देख कर खिलखिलाता है याद है न ..
उसकी आँखों के आंसूं नहीं भाते ..समझ लो इस सत्य को ..
समझदार हों गए हों अब बच्चों वाली हरकतें बंद कर दो ..जान इस सच को ..
अच्छा बहुत उपदेश हों गया आज के लिए ..पर ..अखबार ..?
लगता आज नहीं मिलेगा ..सहर के सूरज को सलाम किया जाये ..
सर पर चढ़ आया है ..बहुत काम बाकी है अभी ..चलूँ अब .- विजयलक्ष्मी

ईद मुबारक कह जाते ..


















काश हम भी आजादी के सिपाही बन जाते ,
हिंदू मुसलमां से पहले इंसान बन जाते .

ये किस्से जो लहू से लिखे जा है आज तक ,
इंसानी मुहब्बत के जज्बों से लिखे जाते .



न रोती इंसानियत खड़ी चौराहों पे इस कदर ,
न लाशों को किसी की काँधे ढो रोते हुए जाते .

गीत वतन में होते अमन ओ चैन के मेरे ,
खुशियों को हम भी आपस में बाँट पाते .

जय राम जी की कह ,वन्दे मातरम दिलों में ,
गणपति बप्पा के साथ ,ईद मुबारक कह जाते .-- विजयलक्ष्मी

Saturday, 18 August 2012

घोल कर पिला देते ..



चटक कर टूटने के आईने के ..
उडती हुई किरचें ..
जब किरकिरी बनी थी ...
दूध मे घोल कर पिला देते ...
शायद हर कष्ट से निजात ...
और आराम ही आराम ...फिर ..
न कोई शक न सुबहा.
बस प्यार ही बचता फिर ..
तकरार सो जाती हमेशा के लिए ..
बुरा लगा क्या ....
मजाक था ...ये एक ...
मगर अंजाम ...???.- विजयलक्ष्मी

बहुत हुआ ...


आईना ,...तुम सच्चे हों या ..
सच बतलाना आज मुझे ..
बहुत हुआ ..

अब मुश्किल हुआ जाता है ..
बिखरना चाहता है दिल ..
बहुत हुआ ..

कैसे कहें, शब्द लौट जाते है..
होठों पर आकर भी सुन ..
बहुत हुआ ..

बादल से बरसते भी है मगर ..
भीगकर भी भीगते नहीं ..
बहुत हुआ ..

बहे जाते है किस जानिब जाने ..
मंजिल है राह मिली नहीं ..
बहुत हुआ ..



वजूद कहाँ है अब लापता हूँ मैं ..
खत का सिलसिला भी नहीं ..
बहुत हुआ ..

चल मर जाते है जी लिए बहुत ..
कोई गिला भी अब नहीं ..
बहुत हुआ ..

क्या नाम लिखने से भला होगा ..
बदल जायेगी किस्मत ..
बहुत हुआ ..

दोस्त कैसे कैसे जमाने में हुए है ..
सिला ए गुफ्तगू भी नहीं ..
बहुत हुआ ..- विजयलक्ष्मी

जश्न ए आजादी


जश्न ए आजादी ...
किसकी आजादी ...देश को बेचने की ,
ताबूतों की दलाली खाने की आजादी 
सैनिकों के परिवारों के मिलने वाले घरों को खाने की आजादी ..
देश के अन्नदाता कृषकों को आत्महत्या की आजादी ,

उनकी बेटियों को रोटी की कीमत में बिकवाने की आजादी ..
गद्दी पर चोर दरवाजे से बैठ प्रधानमंत्री बनने की आजादी ,
घोटालों की आजादी ..
नेताओं की खातिर जवानों को मौत के मुहँ में धकेलने की आजादी ,
सर ए आम इज्जत आबरू छीनने की आजादी ..
जनता के सुरक्षार्थ तथाकथित पुलिस द्वारा ही तनमन लूटने की आजादी ..
जी हाँ ..आजादी आजादी ....जिसे आज तक राष्ट्रीय पर्व घोषत न किया हों ..
वही दिन मनाने की आजादी ...मनाइए ..ये जश्न ए आजादी .
कश्मीर ,गुजरात और आसाम जलाने की आजादी
अपने खूबसूरत को उजाड़ने आजादी ..
भ्रषटाचार को उसके उच्च शिखर पर पहुँचने की आजादी
.आपको भी मुबारक ..
ए मेरे प्यारे वतन ...ए मेरे उजड़े चमन ..
कैसे बचायें तुझको वतन ..
मना सके जिससे जश्न ए आजादी .
कसाव जैसों को लटकाने की आजादी . - विजयलक्ष्मी ..

कौन ख्वाब देखूं करूं किस्से गिला ...

गर खुद पर ही शक होने लगे ,
जिंदगी खुद से ही अब खोने लगे ,
कम लगने लगे शब्दों की किताब ,
अब चुप्पी भली लगने लगी है हमको ..

बियाबां हों गयी है हर राह अब तो ,
जिंदगी की राह खोने लगी है कहीं ,
सवाल ही सवाल है हर तरफ क्यूँ ?
खुद में लगा सवाल बन गए हैं हमतो ..

किस राह जा रहे थे अपनी धुन में हम
किस मोड मुड गए क्यूँ हम ..
कैसे बताए कुछ भी बडी उलझन है ,
खुद से भी लग रहा है बेवफा हुए अबतो.

कौन ख्वाब देखूं करूं किस्से गिला अब ,
ये कौन सी है मंजिल कुछ नहीं पता अब ,
किस्से क्या कहूँ ,कहाँ खो रहे हैं हम ,
तन्हा हैं सफर ,मिली कौन राह हमको .- विजयलक्ष्मी

Friday, 17 August 2012

उफ्फ ! ये बिजली के बिल और नेट के किस्से ,
तन्हाई की बात और अँधेरे के किस्से ,
मुई, जब देखो चली जाती है छोडकर ,
समझती नहीं ,कितनी जिंदगी ,..
जिंदगी और मौत के बीच लटक जाती है 
अस्पतालों में ,स्कूलों में ,मेट्रो स्टेशन पर ..
रेलवे स्टेशन पर ....कभी कभी तो जंगल के बीच वीराने में ...
और बिल के तो क्या कहने ...बिजली जले न जले देना ही है ,.
कहो न कोई सरकार से कभी तो माफीनामा किया करे ...
राहत राशन पर ह

ी.., बिना राशन वालों को भी दिया करे ..
हमारी सुनती कहाँ है ..लगता है धरना देना पडेगा
अन्ना की तरह या बाबा की तरह ..
कल की बात लो ...पूरे पांच घंटे सर्वर गायब ..
स्वतंत्रता का जश्न और ....उसपे सब गायब ...
गजब ...किस्से कहानी ,फिर मेंहमानों की लम्बी लिस्ट ...
और जिंदगी की कहानी का ट्विस्ट ...
पर वो भी अच्छा है ...कभी कभी होना चाहिए ..
पता लगता है , हम कहाँ है ...
जिन्दा है या मर गए है ,
इसके लिए तो शुक्रिया कहना ही होगा..
अभी हम जी रहे है...सांसे है बकाया कहीं कहीं पर. - विजयलक्ष्मी
" प्रदेश में के हर जिले में होंगे आधुनिकतम् सुविधायुक्त पोस्टमार्टम हाउस "
..
जीते जी आंसूं पिए ,और भूख ही खायी होगी ,
मरके सही, आधुनिक सुविधा उपलब्ध होगी .
गम नहीं रहेगा मौत के बाद का अब किसी को ,
जिन्दों को बेबसी, मुर्दों को बन्दगी उपलब्ध होगी.- विजयलक्ष्मी

अभी बाकी हैं कहीं ..

हर शिकायत से ये तय हों रहा है सुन ,
हम अभी तलक तुझमे बाकी है कहीं .

जिंदगी और मौत दिखावे की दुनिया,
इन्ही के दरमियाँ वजूद बाकी है कहीं .

अबाबील सी आवाजें कुछ कमतर हुयी , 
अहसास मिटे या विश्वास बाकी है कहीं .

उल्टा ही लटकना है, सम्वेदना सुनो ,

एक अहसास आज तलक बाकी है कहीं .

सूरज सो गया ,चाँद खो गया जाने क्यूँ ,
तारों को तो उम्मीद बहुत बाकी है कहीं .

मौसम बदलने लगा ,क्यूँ चमन में गुल ?
महक ,निकहत ए गुल अभी बाकी है कहीं.-- विजयलक्ष्मी

ए जिंदगी ,....

ए जिंदगी ,माना गम बहुत है जमाने में 
लगी रहती है दुनिया भी, आजमाने मैं .

वक्त का सिला उसमे भरम अपनों का हों 
तो क्या रखा है भला ऐसे जीने जिलाने में .

पत्थरों के बीच इंसान रहेंगे कहाँ सोच तो 
पत्थर तो रहेंगे मशगूल उसे पत्थर बनाने में .

शिला न पूज ,हर शिला शिवाला नहीं जाती 
जिंदगी लगती है कोई एक मूरत बनाने में .

नादानियां न कर यहाँ अँधेरा ही अँधेरा है
बीतती है जिदगी तन्हाँ, यूँ दीपक बनाने में.- विजयलक्ष्मी

सूरज को सलाम बजा लायें ...




सहर के सूरज को सलाम बजा लाये ,



बज्म में उसकी ये जिंदगी बितानी है .

चमकता है गगन में ,मुस्कुराती है दुनिया ,


वर्ना जमीं की हस्ती ही बंजर हों जानी है         

                         .....विजयलक्ष्मी

Wednesday, 15 August 2012

......नाम लिखो और मजे चखो 
ये तो चलता ही रहेगा ....जो बोलेगा ......
यही ही उसूल .......दुनिया का 
मुल्क नाम हिन्दुस्तान ,
देशकाल नाम ए गाँधी ,
पावर ऑफ अटॉर्नी नाम ए गाँधी ..
नाम उधारी का है जिनका ,
देश की तरक्की से क्या मतलब उनका
उनका क्या दोष ,पुजने वाले को क्या गरज
पूजने वाले की गरज होती है ..
जिन्हें जनता चुनके भेजा वो उन्हें पूज रहें है ..
तो ....???
बदल दो चेहरे मोहरे ,
भीतर से बाहर तलक ,
पत्थर भी भगवान बन जाता है पूजने से तो
इंसान की तो औकात क्या ??
बिना कुर्सी के देश की अम्मा है है वो ..
समझ गए न ....या ..
अब फिर बोलो
वन्दे मातरम . - विजयलक्ष्मी

Monday, 13 August 2012

दरस दिखा जा रे ...


कन्हाई मोहे दरस दिखा जा रे ..

बिन तेरे राधा बावरी हों गयी ..
अब तो लौट के आजा रे ..
कन्हाई मोहे दरस दिखा जा रे..
भोग धरा माखन मिश्री 
आकर भोग लगा जा रे 

कन्हाई मोहे दरस दिखा जा रे ..
मुझसे मुझको छीन रही जो ..
फिर वही तान सुना जा रे
कन्हाई मोहे दरस दिखा जा रे .- विजयलक्ष्मी

Sunday, 12 August 2012

जानते हों सच को ....


















ठूंठ से ,...यही पहचान बन गयी है अब हमारी ,

जंगली पौध ....हंसी आती है खुद पर ....आज ,
हमारा ईमान इतना कमजोर कैसे हुआ ..
खो गया टूट कर बिखर गया रेजा रेजा ,
ऐसा भी कोई जादू है क्या ...तुम हम बन गए ?
वाह ...खाइयों के दुसरे किनारे परकोटे बनाकर दीवारों से बात ..
कुछ अजब सा नजर होगा ...
नैतिकता के किनारे पट बैठी नाव ...
नदी में बही जा रही थी ...किसने लगाम खींची थी 
रथ के पहियों की ,वक्त को बांधा था 

किसने  ?
कसौटियों की हर पराकाष्ठा को कसा था किसने ..
वो कौन था चलती बंदूकों की आवाजों के पीछे ..
मेरी देह को खत्म कर विलीन करने वाला वो कौन ?
वेदना सम्वेदना से रिश्ता बन गया चलो कुछ तो हुआ ..
मेरी उपासना ,तपस्या या ...उन्वान देह के क्या हैं ?
जानते हों सच को ....तुम्हे पता है ...
सीधी सी राह को इतना कितना खोद डाला तुमने .....
लहुलुहान है सबकुछ ...मरहम भी बेअसर होने लगा ..
फिर भी हंस लेते है हम ....भूलना चाहते थे खुद को ..
मगर हर बार मुझे याद कराया ...
कलम से उकेरी उन तस्वीरों को देखा है हमने ...
और हम मर गए ..- विजयलक्ष्मी

डर की खला क्यूँ रहती है ...




हर वक्त डर की खला क्यूँ रहती है जेहन में ,

खत वो लिखने लगे है जिनसे कोई सिलसिला भी नहीं .
जाते नहीं जिन गलियों की तरफ हम जाने कब से ,
जवाब की दरकार क्या करें गर कोई गिला भी नहीं .
कल्पतरु है संग तुम्हारे क्या करना मुझको ,
माया से क्या काम भला,शिवाक्ष बिन सिला भी नहीं.
गौर से देख मुझे,कुबेर सा रिझाएगा क्या ,
मैल है हाथ का मेरे,माटी का पुतला हिला भी नहीं.- विजयलक्ष्मी

कल्पतरु मेरा नहीं है ....


कल्पतरु मेरा नहीं है दरकार नहीं .

राजा स्वर्ग का है इंद्र , भला जताता क्या है..
माटी सा खरा मन ढबके में टूटता है,
उस पे मिट्टी सी माटी का वरक चढ़ाता क्या है..
कल्पवृक्ष माटी का ढेर मेरी जानिब ,
उसकी बेकार सी चमक भला दिखाता क्या है ..
उजलेपन को उजाला ही भाता है ,
कलदार की न सूरत ए दरकार, दिखाता क्या है . - विजयलक्ष्मी

Friday, 10 August 2012

ए जिंदगी ...




खुद से ही जुदा हूँ इस कदर ,
बता, किसी का भी अहसास कैसे रहे .
ए जिंदगी न खफा हों इसतरह ,
तेरे बिन बता जिंदगी का साथ कैसे रहे.- विजयलक्ष्मी

 


"बहुत बेरहम ये दुनिया है गम देके दामन में ,हंसती है,
कहूँ किसको गर नाखुदा ही मेरे जख्मों से रश्क कर बैठे
." - विजयलक्ष्मी 
 

"आ लबों पर तेरे भी तबस्सुम सजा देते है ,
बैठ कुछ देर,थोडा सा ही सही मुस्कुरा लेते है ."- विजयलक्ष्मी

Thursday, 9 August 2012

कहता है अब ,..



गम की राहों से जब से गुजरने लगे हों ,
हर कदम अब तुम निखरने लगे हों .


हमने तो गम खाए है सीने पर जालिम ,
अब जुगनूओं की बात करने लगे हों .


जब रौशनी आई नजर दूर से देखो तो ,
अपनी ही हर बात से मुकरने लगे हों.


अंधेरों में छोड़ा है आज उसने हमको ही ,
कहता है अब ,हद से गुजरने लगे हों .
                                - विजयलक्ष्मी

Tuesday, 7 August 2012

मेरी तरह ..





















मेरे दर्द की छोड़ कुछ अपनी सुना
,
सुना तुमने भी किसी को रुसवा किया मेरी तरह .

भरकर बैठे रहे जज्बात दिल मैं ही ,
हिम्मत न कर सके बताने की उन्हें मेरी तरह.

इन्तजार तो गेसुओं की महक का ,
लबों से मुश्किल है इकरार, बिलकुल मेरी तरह .


पत्थर से शजर और अब गुल ..कांटे ,
बरसते हों दिन रात खुद में, बिलकुल मेरी तरह .


दुनिया बसी है एक खुद के भीतर ही ,
बैठकर अक्सर बात करते हों बिलकुल मेरी तरह .


रूठना मनाना बहुत कर चुके हों तुम ,
कहते मस्त हूँ, पर बीमार हों बिलकुल मेरी तरह .

पुराने साथियों का साथ छूटा है अब ,
सोचा,छोड़ दे देखने ख्वाब भी बिलकुल मेरी तरह .

जी लेंगे, न सोच जो करना है कर गुजर ,
रह जायेगा बंधा मर्यादा में ही बिलकुल मेरी तरह .

                                                                              ....विजयलक्ष्मी