Thursday, 31 July 2014

मैं गंगा हूँ ...गंगा ही रहूंगी ....



नहीं चाहिए तुम्हारी झूठी सांत्वना 
नहीं चाहिए तुम्हारे धन की गठरी 
नहीं चाहिए तुम्हारी सियासत 
न तुम्हारी कमाई अपनी विरासत 
तुम्हे जो चहिये ले जाओ ..बहुत प्रेम है निस्वार्थ भाव लिए 
मैं नदी हूँ ...बहती हूँ किनारों की मर्यादा में 
मैं तडपकर भी अपने जल को गरमाती नहीं हूँ 
मैं किसी को प्यासा कब रहने देती हूँ 
जब जिसने चाह स्नान किया दिखावे का तप और दान किया 
स्वार्थ पूर्ति हित झगड़े किये तलवार निकाली 
देश की सीमाओं की तर्ज पर धर्म की सीमाओं में बाँध दिया 
तट से बंधीं मैं सरहद की तर्ज पर धर्म की सीमाओं में बाँध दिया 
मुझे खूंटे से बाँधने की चाहत लिए तुम ..नाव लिए उतर पड़े 
हर बार मेरे मुहाने आकर नहर नहर कर मेरे टुकड़े किये 
शव भी जलाये तुमने ...घरौंदे भी मिटाए 
मैं चुप थी हंसती रही ...तुम्हारी ख़ुशी की खातिर 
चलती रही खामोश हर दर्द को खुद में समेटकर 
तुमने स्नान ही किया होता तो अच्छा होता ,, लेकिन 
तुमने मुझमे छोड़ा ...तन का मैंल ...मन का छोड़ते तो अच्छा होता 
तुमने जोड़ा लालच अगले जन्म का ..इस जन्म को पवित्रता से जोड़ते तो अच्छा होता 
तुमने छोड़े तन के मैले कपड़े तट पर मेंरे ..
तुम मन को शुद्ध करते मुझमे नहाकर तो अच्छा होता 
मैं इंतजार में रही ...तुम समझोगे कभी तो ..
तुम चुप रहे महसूस करके भी ..मैं भी खामोश बहती थी 
पूछोगे कभी हाल ...दर्द को समझोगे मेरे 
झांक सकोगे रूह में ,,बाँट सकोगे स्नेह को ,,
लेकिन नहीं ..तुम अपनी धुन में.. अपने विचार ..अपनी मनमानी
जानते हो ये सत्य भी मरने के बाद नहीं लौटूंगी कभी ..
क्या इसीलिए जतन से मार रहे हो मुझे !
कर रहे हो मुझे गधला ..भर रहे हो अनाचार की परिभाषा 
खत्म कर रहे हो जिन्दगी की आशा 
जिन्दा रहने के मेरे प्रयास असफल कर रहे हो तुम 
याद रखना ..हर गंदगी मेरी आयु कम कर रही है वक्त से पहले
मैं गंगा हूँ ...गंगा ही रहूंगी अंतिम साँस तक 
तुम दनुज हो जाओ तो... तुम जानो -- विजयलक्ष्मी

कभी जीवन तो कभी प्रलय के नाम में बरसा..





भीगा भीगा सा बादल
इंतजार में बरसा
एतबार में बरसा
नफरत से शुरू हो प्यार में बरसा
दर्द में बरसा मौसम सर्द में बरसा
हद अनहद के साथ में बरसा 
दिल पर घात में बरसा
ख़ुशी की बात में बरसा
कभी विदाई कभी बारात में बरसा
दिन औ रात में
कभी तन्हा तो कभी साथ में बरसा
मुहब्बत ए रुसवाई में बरसा
दिल की शानसाई में बरसा
नजर के साथ में बरसा
मिलन के साथ में बरसा
जुदा हो एकांत में बरसा
जीवन बसंत में बरसा
कभी शुरुआत में बरसा .. कभी अंत में बरसा
कभी अहसास में बरसा
दिल उदास में बरसा
बेरुखी औ तब में बरसा
लिपट अहबाब से बरसा
कभी तूफ़ान संग बरसा
कभी बर्बाद करता सब बदरंग बरसा
कभी सूखे खेत में बरसा
कभी खलिहान में बरसा
कभी घर में तो कभी मकान में बरसा
कभी जीवन तो कभी प्रलय के नाम में बरसा
कभी सुखा सा आषाढ़ तो सावन बाढ़ बन बरसा---- विजयलक्ष्मी

Tuesday, 29 July 2014

मल्हार ( सावन के गीत )

आओ सखियों सावन के गीत हो जाये तीज की शुभ कामनाओ के साथ ..

अरी बहिना राधा के संग घनश्याम
झूला तो झूले नेह सो 

नवरंगी डोरी को झूला पड़ रह्यो जी -- 2
अरी बहिना हिलमिल झुलावे बृजबाम
झूला तो झूले नेह सो
अरी ...

चन्दन की पटुली बहिना मणि जड़ी जी -- 2
अरी बहिना तार सुनहरी जडो काम
झूला तो झूले नेह सो
अरी ...

लम्बे लम्बे झोटे सखियाँ दे रही जी -- 2
अरी बहिना कान्हा को ले लेके नाम
झूला तो झूले नेह सो
अरी ..

गावे अकेला नित करी कथन जी --2
अरी बहिना वास मिलो है बृजधाम
झूला तो झूले नेह सो
अरी ....

Monday, 28 July 2014

" किस लिए सत्य ..कहाँ है सत्य ,,"



कीमत सत्य की ..
क्या धन ,..या जीवन 
सुना है कुछ लोग चरित्र से गिर जाते हैं 
देह के रिश्तों से भी गुजर जाते हैं 
वासना का नग्न नृत्य क्या चारित्रिक हनन 
सत्य के लिए ,
क्यूँ जान मांगते है लोग 
क्यूंकि डरते हैं सत्य से 
सत्य ..बोल पर्दा खोल 
" सत्यम शिवम सुन्दरम "
क्या सम्भव है सत्य बोलना सत्य तो मर चुका है
तुम नहीं जानते ,,
जब देश की आजादी के लिए छल किया गया था हिन्दुस्तानियों के साथ
चंद दलालों ने कीमत पायी थी कुछ खबरों की
सत्य की कीमत तुम ...नहीं तुम किसी सत्य की कीमत नहीं हो
झूठ के सौ चाहने वाले सत्य के पुजारियों के लिए झटका नहीं धोखा
किस लिए सत्य ..कहाँ है सत्य ,,
सत्य चीख रहा है कब्र में ,जीवन के सब्र में
सत्य को कफन दिया जा चुका है
कफन के बाद कीमत नहीं दी जाती
झूठ को उसका हक मिल चुका ...कब तक नौचेगा हमे
अब तो निखरने दी सत्य को ,
झूठ की अखरने को देख सत्य को
हर तरफ खुशबू सा बिखरने दो सत्य को
अस्तित्व संवरने दो सत्य का
कलम को गुनगुनाने दो सुर सत्य का
एक उंची तान उठाने दो सत्य को
झूठ की बलि चढा ..परचम लहराने दो सत्य को
कीमत नहीं जश्न मनाने दो सत्य को
हर चेहरे का आइना बन जाने दो सत्य को
हर चेहरे पर मुस्कुराने दो सत्य को
मन की मलिनता मिटाने दो सत्य को
हर दिल पर सियासत जमाने दो सत्य को
तुम सत्य हो न ....मुझे भी अपनाने दो सत्य को
भाग्यरेख बन जाने दो सत्य को
जिह्वा पर आसन जमाने दो सत्य को
न्याय का साथ निभाने दो सत्य को
ईमान संग निखर जाने दो सत्य को ..
ठहरो ,,,मेरा हो जाने दो सत्य को --- विजयलक्ष्मी


Sunday, 27 July 2014

काश कह सकती मैं ,तुम्हे "ईद मुबारक हो "



काश कह सकती तुम्हे "ईद मुबारक हो "
किसे दूं ...बताओ कैसे कहूं ,लहू बिखरा पड़ा है मेरा 
क्या नजर-अंदाज कर दूं लुटता आंचल 
क्या नजर-अंदाज कर दूं टूटती पायल 
वो खंजर ,,लहू गिर रहा है जिससे रिसकर
वो आँख रिस रहे हैं ख्वाब जिसके भीगकर 
आग तो जल रही हैं नापाक इरादों सी
ममता आंचल तो टुकड़े टुकड़े बिखरा पड़ा है दूर तक 
युद्ध से शुद्ध हुआ कौन ..तलवार लेकर प्रबुद्ध दिखा कौन 
ये कौन डूबा है लहू नद में जो दर से निकलकर बह उठी हर द्वार तक
क्या नमाज क्या पूजा ,,खुदा कहाँ बैठा है ढूंढना होगा
पूछना तुम भी ...क्या वो वक्त कभी आयेगा
जब नयन रतनारे होंगे
इन्सान इन्सान के प्यारे होंगे
उद्वेलित आवेग को किनारे मिलेंगे
और उठती हूक की भरपाई किसी के लहू से नहीं होगी
नहीं जलेंगे घर .,,मकान नहीं होंगे
आग में लहराते परचम दूकान नहीं होंगे
और सावन की हरियाली चैन से झुला झूल सकेगी
जलधार तो गिरेगी मगर बन फुहार खुशियों की
नयनों से बादल नहीं बरसेंगे
रमजान में राम ही राम होंगे ...चैन की मुरुली बजाते घनश्याम होंगे
नूर का हूर चमकेगा ..नहीं ईमान दूर ढलकेगा 

फिर कोई फातिमा नहीं रोती मिलेगी ..कौन विश्वास देगा मुझको 
नहीं चमकेगी कोई तलवार किसी गर्दन पर
और कह सकूंगी मैं तुम्हारे कानों में मुस्कुराके "ईद मुबारक हो "
किसे दूं ...बताओ कैसे कहूं ,लहू बिखरा पड़ा है मेरा
क्या नजर-अंदाज कर दूं लुटता आंचल
क्या नजर-अंदाज कर दूं टूटती पायल
वो खंजर ,,लहू गिर रहा है जिससे रिसकर
वो आँख रिस रहे हैं ख्वाब जिसके भीगकर
आग तो जल रही हैं नापाक इरादों सी

क्या सच में खुशिया बांटने का अवसर है ये 
और देख सकूंगी तुम्हे मुस्कुराते सुनकर वही शब्द अमन औ ईमान के 
खिलखिलाते हुए जब तुम्हारी लाइ नई ओढ़नी ओढकर "ईद मुबारक हो "---- विजयलक्ष्मी



Saturday, 26 July 2014

" नवीनीकरण "

नवीनीकरण 
रिश्तों का ...रिश्तों की किश्तों का 
अहसास के फरिश्तों का 
नवीनीकरण 
पालिसी का या जिन्दगी का ..
भविष्य की सुरक्षा का ..या अतीत की बन्दगी का
नवीनीकरण
किस किस का नवीनीकरण
कागजों पर भौतिकता का नवीनीकरण
मन का ,ईमान का ,पुरुष के पुरुषत्व का औ ..
पुरुषार्थ का ..जमीर का .
स्नेह का
रूह का ..मन के बगीचे का
दिल की दीवार पर टंगी पुरातन-वादी ग्रंथियों का
विकास की राह पर अवरोधों का
व्यर्थ तूल पकड़ते क्रोधों का
नश्वरता में अमरता का ..हो सकेगा नवीनीकरण .
वस्त्रो की तर्ज पर विचार का
सामान की तर्ज पर भ्रष्टाचार का ,,अनाचार का.. व्यभिचार का नवीनीकरण
फटी जेब का उद्धार हुआ
उधड़ते रिश्तों का क्यूँ खड़ा सवाल हुआ
सिल देते तो अच्छा था
जुड़ा हुआ घर संसार सच्चा सा लगता है
पुरानी दीवारो पर भी नया रंग रोगन
मजबूत नींव पर कंगूरे होते हैं रोशन
इसीलिए नवीनीकरण ...
समय बेल की निराई गुड़ाई छटाई ..बराबर खाद पानी ..
फसल सुंदर ..ज्यादा अच्छी मिलती है
तुम जानते हो सब बस मानते नहीं थे कभी .--- विजयलक्ष्मी

Friday, 25 July 2014

"फाख्ता सी याद मुंडेर उतरते रहे"

" बेरंग सी राहे मिली बहुत 
हम उनमे ही रंग भरते रहे 

गुजरते मिले नक्श ए कारवाँ
सब उसी डगर से गुजरते रहे 

जहर भरा कूजा ए जिंदगानी 
उम्रभर उसी को निगलते रहे 

बंजर जमी फसल को तरसती 
मन बदरा बना हम बरसते रहे

लहर से मचलना सीखू कैसे 
नाखुदा संग डूबते उतरते रहे 

अहसास समन्दर में तिरे खूब 
फाख्ता सी याद मुंडेर उतरते रहे "--- विजयलक्ष्मी 

" टोफियों का पेड़ धरती पर उतर आये "

" आओ कुछ तितलियाँ उड़ाते हैं गुलो पर 
कुछ भ्रमर बुलाकर गुंजार मचाते है चमन में 
रात के अँधेरे को बंद करलेते है हथेलियों में अपनी 
सितारों को जुगनूं बना घुमाते हैं गगन में 
बैठकर ख्वाबों के उडनखटोले पर सैर करे आसमान पर 
चंदा का हाथ पकड़ सूरज को आवाज लगाये 
गुलों को गगन में सजा आये 
क्या हो अगर इन्द्रधनुष धरती पे हो खिला 
टोफियों का पेड़ धरती पर उतर आये 
आँखमिचौली खेलते हम बादलो में छिप जाये 
बून्द बनकर सहारा के रेत को महकाए
हर चेहरे पे मुस्कुराहट हो गम सबके चुरा लाये
बाँट सके ख़ुशी किसी बंद थैले से निकाल, जिन्दगी गम से उबर जाये
 "--- विजयलक्ष्मी 

Thursday, 24 July 2014

"..और एक ही आंसू बहेगा आधा आधा हमारी तुम्हारी आँख से"

" सडक पर साहित्य का तमाशा..बुद्धिजीवियों में हताशा 
अज्ञानियों के हाथ में वेदों की व्याख्या 
जंगल काट दोगे धुर तलक तो जरूरी है शेरो का आना गाँव में 
हर बयाँ लहू का कहता है जान की बाजी लगी किस तौर है 
संसद में विपक्ष का भी शाही अंदाज में लिपटी मुफलिसी का दौर है
देश को बेचकर भी चैन से खोया नहीं जिनका वही उँगलियाँ उठाये हैं 
पीढ़ियों से औलाद जिनकी आतंक मचाये हैं 
समन्दर में तैरने वाला ही मरता है प्यास से याद है मुझे
चटकी हुई धूप में बारिश के बाद टूटकर गिरते हुए पहाड़ देखलो
कुछ सड़के एसी भी है जो जाने के बाद दिखती है लौटती मगर लौटती कब है तुम जानते हो ये सच
तुमने सोचा होगा सन्नाटा पड़ा है सब सो गये हैं चैन से
बरसे है बादल अहसास के तुम्हारी आँख से किस कदर नाव कम पड़ने लगी है निकलने के लिए
उठती लहर ने लील डाले हैं कितने घरों के चिराग
जमी की तो क्या कहे आसमान में हवाए भी लगाने लगी है आग
जिन्दगी मोहताज नजर आने लगी
सभ्यता का कौन सा मोड़ है ये जिन्दगी गगन में ही जल मरी
तुम न कहते थे ..कठिन दौर होगा ए जिन्दगी तुम्हारा
बिन फाटक की रेल ने आँखों का उजाले ही रौंद डाले
समय की धार बहती जा रही है निस्पृह सी जिंदगियों को लीलकर जैसे कुछ हुआ नहीं
हाहाकार जो मचा है बहते हुए लहू में बताना भी मुश्किल है
कठिन दौर होता है इंतजार का वही करने को कुछ नहीं हाथ में और काम पड़े हो ढेर से
अहसास की चांदनी तान कर दूरतक खड़े हो जिस किनारे पर
देख लेना एक दिन तुम स्पर्श करती रेखा से त्रिज्या से केंद्र बने देखोगे खुद को
और एक ही आंसू बहेगा आधा आधा हमारी तुम्हारी आँख से
जिसमे ख्वाब जिन्दा दिखेंगे मरने बाद भी
मेरे भी
और ...तुम्हारे भी
शायद एक दिन
लो मिल गया तेजाब लहू से मेरे भी
" ---- विजयलक्ष्मी

" सुलगते जज्बात भीगी अगरबत्ती से "

"आवाज तो दबकर रह गयी शोर में ,
मगर देशराग गूंजता है नफस नफस ||

चिरैया को कैद कर सैयाद खुश हुआ 
तोता तो कैद में बैठा कफस कफस ||

कटते हुए जंगल परेशां इंसान क्यूँ 
खाली खोपड़ी की कौन हवस हवस ||

उडती तश्तरी तेरे शहर की तलाश में 
कब्र में भी जिन्दा बैठे तरस तरस ||

सुलगते जज्बात भीगी अगरबत्ती से 
गिरते रहे हम बादलों से बरस बरस || "---- विजयलक्ष्मी 

Sunday, 20 July 2014

और मन की कांवड़....... जल चढाने काँधे चढ़ी

" टूटकर गिर रहा वक्त पिस पिसकर क्यूँ भला 
और टूटकर रिस रहा है पत्थर 
अगर नहीं तो ये बता .." बहते हैं क्यूँ सोते पहाड़ से" 
और झरने क्यूँ नदी से हो गये 
जम गयी है आग मन में बर्फ सी 
फिर पिघलती ही मिलेगी सदियों तक देखना 
तय करती है सफर ख्वाब-कश्ती युभी इम्तेहान सा 
और मन की कांवड़....... जल चढाने काँधे चढ़ी 
हर बढ़ता हुआ कदम विश्वास बस विश्वास का है 
खंडित हो रहे इन्सान के भीतर जलती अखंड ज्योत सी आस का है "--- विजयलक्ष्मी

Saturday, 19 July 2014

प्रथम स्वतन्त्रता सेनानी .."शहीद मंगल पाण्डेय " के जन्मदिवस पर कोटिश: नमन !!

जयहिंद !!!!!!
प्रथम स्वतन्त्रता सेनानी .."शहीद मंगल पाण्डेय " के जन्मदिवस पर कोटिश: नमन !!

संघर्ष ही जीवन बनाया जन्म से मरण तक 
सूखी बंजर धरा को सींचना सिखाया लहू से 
आजकल मरते हैं क्यूँ किसान भूख से गर शिलालेख पटे हैं सरकारी नियामत से 
गिरते होंगे आंसू ,,ईमान पर तौलिये दर औ दरीचे सजे हैं जिनके लहू से
स्वतन्त्रता का दीप जलाया और जीवन किया निसार
कैसी ख़ूबसूरत जिन्दगी आरामतलब कहाँ ,निगाह ए तलब बसी लहू में
राष्ट्र के नाम लिखा ईमान और लुटा दिया धडकनों को माँ भारती पर
आंचल में मिला ढोए जख्म जिन्होंने अपने लहू से
प्रथम युद्ध की रणभेरी बजाई उगलती आग में जले
कोटिश: नमन तुम्हे सपूत माँ भारती के स्वतन्त्रता की होली खेली लहू से
--- विजयलक्ष्मी




Friday, 18 July 2014

वो एक आखिरी दिन ...

वो एक आखिरी दिन 
जब मुकम्मल होगा 
खूबसूरत नजारा नजरों में बया होगा ..

उसी एक आखिरी दिन 
ए जिन्दगी इतनी मोहलत की जरूरत भी क्या थी ,
तेरी अमानत है ...उठा ले जब जी चाहे तेरा 
वक्त लम्बा तो बहुत है अनजान सी हैं राहे 

उसी आखिरी दिन 
बहुत रंज हुआ अभी दिन बकाया है मिलन के ,
उम्र ए इन्तजार कुछ ज्यादा ही हो गया हमारा
कुछ तो कट गया.. कट ही जायेगा वक्त बकाया

उसी इक आखिरी दिन
जिसके इंतजार में हो तुम
जश्न की रात होगी वो जिसे रौशन करेंगे सितारे ,
छोडकर धरती ,,हम भी आसमाँ के बनेगे प्यारे
एतबार पे हैं जिन्दा समझ लेना ए जिन्दगी

उसी इक आखिरी दिन
जिसकी तलाश है
कटते रहे दिन सब हद ए इन्तजार में ,
बदला नजारा कटेंगे उम्र ए इंतजार में
वक्त की धार पर होकर सवार चल पड़े

उसी एक आखिरी दिन
हूँ सफर पर
शुक्रिया अता करने को पास अल्फाज नहीं है ,
ए हद ए इंतजार...सुन, तेरे मोहताज नहीं हैं.
महकते से लम्हात हैं शिकस्ता हालात नहीं है
उसी एक आखिरी दिन ... --- विजयलक्ष्मी

Thursday, 17 July 2014

" कोख कुचली जिसकी वो औरत ......"


कुरेदकर गर्भ की दीवार ,,
काट डाला अंग प्रत्यंग 
मारी गयी काटकर औरत 
कोख कुचली जिसकी वो औरत 
फैसला पुरुष का ,,
लड़का जनेगी तो पूजी जाएगी
तू माँ तो बनेगी ..
बिगड़ा तो नाम दुनिया तुझे ही धरेगी
सुधर गया तो हकदार है पुरुष
अगर जिन्दा रह गयी कोई जिन्दगी
पढ़ेगी बढ़ेगी औरत
पल्लू और चार दिवारी का सच सहेगी औरत
क्या बनेगी फैसला पुरुष का
जिन्दगी जियेगी औरत
साथ देने को तैयार रहे औरत ..
क्या करना है फैसला पुरुष का
लडकी हुई सयानी ..
उम्र हुई ब्याहनी ..पसंद करेगा पुरुष
तू आटे की लोई ..
तेरी इच्छा ..तेरा फैसला मायने नहीं कोई ,,
घर तुझसे बनता है ,,सुना है केंद्र होती है औरत ,,
उस केंद्र को परिछादित करता पुरुष ,,
सुना है आधी दुनिया का वारिसाना हक है तुझे ए औरत ...
लेकिन ...
तू मुहब्बत की हकदार है या नहीं
कितने पल तेरे हिस्से ..तू जायदाद है ,,
बस यही तेरी अंतिम औकात है ..
यही फैसला ..है ,,समाज का कर्ताधर्ता है पुरुष
--- विजयलक्ष्मी



"माँ सच कहना क्या बोझ हूँ मैं 

इस दुनिया की गंदी सोच हूँ मैं 
क्या मेरे मरने से दुनिया तर जाएगी 
सच कहना या मेरे आने ज्यादा भर जाएगी
क्यूँ साँसो का अधिकार मुझसे छीन रहे हो 
मुझको कंकर जैसे थाली का कोख से बीन रहे हो 
क्या मेरे आने से सब भूखो मर जायेंगे 
या दुनिया की हर दौलत हडप कर जायेंगे 
पूछ जरा पुरुष से ,
"उसके पौरुष की परिभाषा क्या है "
जननी की जरूरत नहीं रही या 
जन लेगा खुद को खुद ही ?
हर मर्यादा तय करके भी उसको चैन नहीं 
भोर नहीं होती जब होती रैन नहीं 
कह देना कह देना दुनिया में तो उसको मुझे लाना होगा 
वरना आगमन को पुरुष को खुद ही समझाना होगा 
जितना मुझको लील रहा है कह देना 
दर्द बेटे न मिलने का फिर सह लेना 
वंशबेल की शाख अधूरी रह जाएगी 
पूरी होगी तभी 
" जब लडकी धरती पर आएगी " "
.--- विजयलक्ष्मी

Wednesday, 16 July 2014

माँ सच कहना क्या बोझ हूँ मैं ..



" माँ सच कहना क्या बोझ हूँ मैं 
इस दुनिया की गंदी सोच हूँ मैं 
क्या मेरे मरने से दुनिया तर जाएगी 
सच कहना या मेरे आने ज्यादा भर जाएगी
क्यूँ साँसो का अधिकार मुझसे छीन रहे हो 
मुझको कंकर जैसे थाली का कोख से बीन रहे हो 
क्या मेरे आने से सब भूखो मर जायेंगे 
या दुनिया की हर दौलत हडप कर जायेंगे 
पूछ जरा पुरुष से ,
"उसके पौरुष की परिभाषा क्या है "
जननी की जरूरत नहीं रही या 
जन लेगा खुद को खुद ही ?
हर मर्यादा तय करके भी उसको चैन नहीं 
भोर नहीं होती जब होती रैन नहीं 
कह देना कह देना दुनिया में तो उसको मुझे लाना होगा 
वरना आगमन को पुरुष को खुद ही समझाना होगा 
जितना मुझको लील रहा है कह देना 
दर्द बेटे न मिलने का फिर सह लेना 
वंशबेल की शाख अधूरी रह जाएगी 
पूरी होगी तभी 
" जब लडकी धरती पर आएगी ".

--- विजयलक्ष्मी

Tuesday, 15 July 2014

" जिम्मेदारी मात्र औरत की ही है ? "

हाशिये पर रख छोड़ी 
जिन्दगी के 
तिनका भर 
सहारे पर 
जिन्दा हैं ,
बदलते समय की ढाल 
के 
सवाल पर शर्मिंदा हैं 
अखबार बवाल करता मिला कहीं 
कहीं कोताही कानून की 
ईमान की दुकान पर
सच रोया ज़ार ज़ार
मोल
जमीर का
खुद बिका हुआ
इक शख्स लगा रहा था
क्षण क्षण
खुद को खरीददार बता रहा था
कुछ टुकड़े उठा लिए मैंने ..
इल्जाम लगा रहा था
अब हर कोई बदलने की फ़िराक में
कसम है
"तुम्हे "
वक्त का क्या है पल पल बदलता है
माया क्षण भंगुर
देह नश्वर ..ज्वलनशीलता धारे
मुट्ठीभर लकडियो के साथ
भस्मीभूत
विसर्जन जिन्दगी के सफर में
टूटकर बिखरे भी तो खनक होगी
कांच सी
और उठाओगे गर
लहुलुहान होगी अंगुली
किरचे चुभेंगी
जख्म हरे रहंगे नासूर से
जज्बात की झरना ...या
या स्त्रोत पत्थर फोड़कर बह उठा है
अब भागीरथ कौन है यहाँ
किसे मापना है समन्दर का नवीन पथ
सावित्री या सीता ...द्रोपदी या कोई पतिता
पुरुष प्रधान समाज में ..
किसने बनाये वो रास्ते..जो लौटते ही नहीं घर से निकलकर
अधिकार सिर्फ तुम्हे ही क्यूँ
क्या कही डरता तो नहीं है समाज औरत के व्यक्तित्व से
इसीलिए बंधन ...कड़े और कड़े ,,
सिंदूर खुद भी तो लगाये ,
पहने नाक कान के बंधन इज्जत बना दी गयी चूड़ियों में कांच की
चरित्र देहलीज के भीतर भी शर्मिंदा सा क्यूँ होता है
आँखे सिकती हैं क्यूँ देह...फिर भी सफेदपोश महान आत्मा
क्या ईमान जमीर चरित्र जरूरत भूख ...
जिम्मेदारी मात्र औरत की ही है ? --- विजयलक्ष्मी

Monday, 14 July 2014

"ये सच जानती हूँ ...तुम कोलम्बस जो ठहरे .."

तुम जीत का जश्न मनाओ ,
सुनो , मेरी हार पर खुश हो न 
मगर ..याद रखना इक छोटा सा सच ,,
तुम जीते क्यूंकि मैंने हार स्वीकार कर ली 
अन्यथा ...जूझते रहते आजतक भी मुझसे 
और ..मुझे युद्ध नहीं चाहिए तुम्हारे साथ ..
तुम्हारा साथ चाहिए ,,
जिदगी के युद्ध में ,,
जश्न मनाओ 
बहुत खुश हूँ मैं भी तुम्हारी हर जीत पर 
मगर ...याद रखना इक छोटा सा सच ,,
मैं कमजोर नहीं हूँ
हारा हुआ कमजोर या दया का पात्र नहीं होता
हकीकत में सम्मान का हकदार है वो
मुझमे तुम्हारी जीत स्वीकारने की हिम्मत है
मुझे खुद को झुकाना भी आता है
अन्यथा ...याद रखना मैं टूट भी सकती थी
मगर ...मैं टूती नहीं हूँ
क्यूंकि टूटकर मर जाती ..
तुम्हे पहली बधाई कौन देता
तुम्हे जिन्दा रहने का वो प्रथम अहसास कौन कराता
मगर ...याद रखना मीठा खाने की सीमा होती है ,
लेकिन ...नमक ,,जरूरी अहर्ताए हैं उसके पास ,,
ऊब जाओगे जिस दिन ...मैं हूँ न खार लिए ,
सतत साथ ...ज्यूँ नदिया संग किनारे चले
जीवन का चुभता हुआ सत्य लिए हूँ .
याद रखो ये सत्य ..रंज का शूल साथ लिए हूँ ,,
बोलना जरूरी नहीं है.... उपजने दो अंतर्मन में स्वत:
गंगा का आगमन या उसमे आचमन ,,
धन्य हुए दुर्लभ दर्शन पाकर
यक्ष प्रश्न ..मैं कौन हूँ ?...प्रश्न अप्रतिम है ...बिम्बित करना चाहती हूँ स्वरूप ..
पगले हो क्या ...आत्माओं का स्वरूप कही देखा है कभी
रगं और आकार होता ही कब है..
क्या ढूँढू ,,क्यूँ ढूँढू किसके लिए भला ,,
मेरी तलाश ...अनुसन्धान....विज्ञानं
जब पूरी होगी ..जान जाओगे मुझसे पहले तुम
ये सच जानती हूँ ...तुम कोलम्बस जो ठहरे
मगर ...याद रखना यद्यपि मैं भागीरथ भी नहीं हूँ
लेकिन ...गंगा में उतरने वाली प्रथम मैं ही हूँ शायद
और ..एक सत्य यह की डूबने वाली अंतिम ईकाई ---- विजयलक्ष्मी

" यद्यपि मैं अभिमन्यु नहीं मगर फिर भी ..."



जानते हो न ...अभिमन्यु को 
वही ....अर्जुन पुत्र 
सुभद्रा के गर्भ से ज्ञान सीखकर आया था दुनिया में 
निष्ठुर दुनिया ने परीक्षा ले डाली उसके ज्ञान की उम्र के सोलहवे साल में 
ओह ..माँ की तंद्र न टूटी और वंचित रह गया ..
चक्रव्यूह की रचना ने उसे लील लिया 
सगे सम्बन्धी लूट ले गये बाल-जीवन 
युद्ध क्रूर होता है ...लेकिन वीर खौफ नहीं खाते 
युद्धरत रहते हैं प्रतिपल 
अंतिम द्वार बना काल उसी अभिमन्यु का 
सुनी है न तुमने ..
एक चक्रव्यूह रचा गया था द्वापर में
एक तुमने रच डाला ..
गर्भ में नहीं सीखा था चक्रव्यूह तोडना ..अभिमन्यु तो रहा नहीं
न माँ सुभद्रा थी न पिता अर्जुन
कर्मबेधी हुनर सीखते रहे दुनिया के व्यूह में रहकर
और इक दिन दुसरे चक्रव्यूह ने मुझे भी व्यूह के केंद्र में धर पटका लाकर
प्रयास जारी है ..उसी एक दिन से आज भी
डूबते उतरते हैं जब तक जीवन है प्रयास है ..
प्रयास है तो शायद जीवन है ..
यहाँ द्रोण कृपाचार्य दुशासन है तो सभी मगर ...
दीखता नहीं है कोई भी ..
मौत का इंतजार है सभी को फिर भी ..
एक आशा है जो छूटती ही नहीं
जिन्दा रहने का अनथक प्रयास यूँही जीवन धारा के मझधार में
डुबाता उबारता है मुझे ,,
और फिर जीवन के लिए प्रयास फिर एक नया द्वार खुलता है चक्रव्यूह का
खींचता है मौत के झंझा की और ..मगर
इक नया प्रयास फिर बचा लेता है ...और
यद्यपि मैं अभिमन्यु नहीं मगर फिर भी ...
यही क्रम क्रमानुसार चल रहा है और कदम बढ़ रहे है
कभी सप्रयास कभी अनायास ..
जानिब ए मंजिल ...
आजभी
क्रमश: !!
---- विजयलक्ष्मी

Wednesday, 9 July 2014

" या फिर तुम्हे गंगाधर बनना पड़ेगा..."

नजरे खोज रही थी तेरी तस्वीर 
उसी दीवार पर....जख्म बकाया दिखे रिसते हुए 
नित्य ही दरवाजे पर बजती हैं घंटी ..लगती हैं निरर्थक सी 
इन्तजार ...इन्तजार ही रहेगा उम्रभर शायद ..लेकिन मन नहीं मानता 
लगता है तुम लौटोगे जरूर ..एक दिन 
न तुम आये न तुम्हारी जिसे तुम उतारकर ले गये 
खाली होकर भी ख़ाली नहीं है 
मेरी रूह टंगी है उसी खूंटी पर उसी दिन से 
वो अक्स बकाया है मुझमे बसा ...तुम उस अक्स को नहीं उतार पाए 
हां उन्ही सीमओं रेखाओ में बंद है ,,
जिन्हें तुम स्वयम खींचकर गये हो ...
सवाल तो सभ्यता कर ही नहीं सकती हक ही नहीं है बस जवाब बनती है
इसीलिए शायद सीता भी धरती में समाई थी ..
क्यूंकि राम ने कुछ सवाल सीता की आँख में पढ़े और त्याग दिया
कैसे सामना करते नित्य ही उगते सवालों का ,,
उपाय यहीं सूझा ...राम से तुम भी उसी राह चल पड़े त्यागकर
सोचकर देखना ...एक सवाल से बचने के लिए सवालों की दीवार तुम्हारे भीतर बन गयी
तोड़ पाओ तो मुझे बताना ...
क्या जवाब मिले ?
जरूरत नहीं इच्छा है जानने की ..यदि सम्भव हो ,
यूँभी तुम ....कहते कब हो ...फिर भी हर आवाज चीखती सी पहुंच ही जाती है
जिन टुकडो को साथ ले गये हो ...चाहो तो फेंक सकते हो
क्या करोगे सम्भाल कर ..
व्यर्थ दर्द ही देंगे तुम्हे
कुछ विचार तुम्हारी तन्द्रा भंग करते रहेंगे हमेशा
वापिस तुम करोगे नहीं ...
उसके लिए तुम्हे आना पड़ेगा या ..
या फिर मुझे बुलाना पड़ेगा जो सम्भव ही नहीं है शायद
हाँ ...चस्पा देना नगर श्यामपट पर ...
पहुंच ही जायेंगे ..आते जाते ,,हवा के संग या किसी के काँधे सवार होकर
कभी कभी लगता है तुम ही वो प्रश्नपत्र हो ...
जिसके इंतजार में थी रूह आजतक
लेकिन हल भी मिलेगा या नहीं ...
नहीं मालूम ?
या अभी कुछ और बकाया है कहीं ..कहा नहीं जा सकता
समय धार पर सवार है मझधार में लडखडाते से
डूबते उतरते से ...कलम को पतवार बनाने की कोशिश में
हम कोलम्बस नहीं है हमे मालूम है
बस एक खाली सी दीवार ,,तपती सी हवा ...बिन पानी के बादल
सूखी सी नदी ,,सहारा की नागफनी से चुभते है ..
यही गुण है ..यही अवगुण है
बाकि तुम बेहतर जानते होंगे ..
क्यूंकि हर फैसला तुम ही करते हो ..
मैं ....मुझे तो मानना है बस
तुम पुरुष ....और मैं नारी .......
क्यूंकि लक्ष्मीबाई दूसरे के घर में ही अच्छी लगती है
या फिर तुम्हे गंगाधर बनना पड़ेगा
|---- विजयलक्ष्मी

"खुशी को किसी की न नजर लग जाये "

कैसे कटे रात अन्धेरा घनेरा ,
न जाने खबर कोई कब आ जाये ..

वो धरती सितारे चंदा चाँदनी ,
न जाने सब किस पल बहक जाये ..

मोती पलक से घूंघट उठाकर ,
निकल कर कपोलों पर ढलक जाये ..

गम या खुशी उनको पता क्या ,
न जाने कौन कौन रंग में रंग जाये ..

अब दिल ए गम के तराने सुना ,
खुशी को किसी की न नजर लग जाये..
..विजयलक्ष्मी 

Tuesday, 8 July 2014

न हो कच्चा हमारी दोस्ती के साथ का रंग

दहककर महकता है यूँभी जज्बात का रंग ,
देखना उड़ न जाये किसी मुलाकात का रंग.

न हो मिलाने से हाथ उतर जाये हाथों में ही 
न हो कच्चा हमारी दोस्ती के साथ का रंग ,

अपनी बस्ती तेरे भीगे से ख़्वाबों में बसी है
वो खत सम्भालों बया है मेरे जज्बात का रंग 

तेरी आँखों के समन्दर में लहर लहर भीगे 
रूहानी स्नान लगता है अश्क ए बरसात का रंग

तेरे शहर को शहर ए मुहब्बत कहूं कैसे बता
अलामत मलानत संग किस-किस ख्यालात का रंग

इश्क ए खुदा औ इबादत से बेहतर मिले गर
चढ़ा लो अपने आप पे तुम भी उसी जात का रंग .-- विजयलक्ष्मी 

Friday, 4 July 2014

" यूँ बदलने से तबियत बहल जाती गर.."

इतना भी गुरुर अच्छा नहीं मौला मेरे ,
कदम जमीं पे ही रखना ओ, खुदा मेरे ||

जिन्दगी क्या है लम्हे में गुजर जायेगी 
मेरा ईमान सलामत रखना ओ,खुदा मेरे|| 

बरस ले आज तू भी तेरा वक्त आया है 
बस अता करने दे सजदा ओ, खुदा मेरे ||

जिन्दा हूँ कहीं तुझमे अजब सी बात हुई 
बहुत खूब यूँ जिन्दा रखना ओ, खुदा मेरे||

यूँ बदलने से तबियत बहल जाती गर
हालात यूँही महफूज रखना ओ खुदा मेरे ||--- विजयलक्ष्मी