Sunday, 7 June 2020

उजड गए हम अपने मकान से

उजड गए हम अपने मकान से उनकी मेहरबानी हुई ..
वो रोज बुलाते थे हमे आवाज देकर ,


हम न समझे उनकी रंजिशें ,बेदिली भी रास आने लगी 
चल दिए अब वो हमसे मुह फेरकर .


उन्हें क्या कहें अब दिल रोता भी नहीं रिसता भी नहीं 
देखता वो दर..जिसे गए वो भेड़ कर ,


मेरी मुहब्बत तमाशा ही हो गई अब तो, क्या छुपाऊँ
नाम न आयेगा, जुबां चली अहद लेकर.


छोड़ दिया मेरी गली आना और आवाज लगाना भी ..
थक गयी जिंदगी भी उन्हें आवाज देकर.


रोशन उजाले किसी और छत पे हों कोई गिला नहीं
मेरी मुडेर से सूरज चला रौशनी लेकर ,


सिमटने की जरूरत ही खत्म हुई अब उजड़ने दो हमे
मर भी न पायंगे हम, बदनामी देकर.


रोशन रहे दुनिया, दुआयें जो सुन सकें कही अनकही
नासूर हुए हम नामुराद चाहतें लेकर .
---विजयलक्ष्मी
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Wednesday, 1 January 2020

"सोचो ,क्यूँ हैं कांटे संग गुलाब के ,

"सोचो ,क्यूँ हैं कांटे संग गुलाब के ,
कैसा खालीपन है बिन इन्कलाब के ?
मंजिलों की राह आसां नहीं होती 
क्यूँ सूनापन रोता है बिन सैलाब के ?
रिश्ता रूहानी बे-सबब खूब हुआ 
क्यूँकर सिमटी दुनिया बिन ख्वाब के ?
शून्य पसरा क्यूँ समन्दर के खारेपन सा
कमल खिलता कब है बिन तालाब के ?" 

------- विजयलक्ष्मी
.
जीना सीखने के बाद भी आहत आहट रुला जाती है ,,
जिन्दगी अहसास के फूल पलको पर खिला जाती है ।।   ---- विजयलक्ष्मी


इश्क औ गम का रिश्ता भला रिसता क्यूँ हैं ,,
मुस्कुराकर इश्क की चक्की में पिसता क्यूँ है ||    --- विजयलक्ष्मी































नम मौसम को बदलती है उमड़ते अहसास की गर्म चादर 
 ,,
जिसे ओढकर अक्सर मातम भी खुशियों का राग सुनाता है।।  ----   विजयलक्ष्मी




और मुस्काती हूँ बैठ ख्वाब के हिंडोले मैं ,,
रच बस मन भीतर पुष्पित रगों के झिन्गोले में | 
विजयलक्ष्मी

मुझे चस्का लग चुका

सर्द भोर का सूरज
तपिश तो देता है
छोड़ जाता है एक ठंडापन

ठिठुरता अहसास
धूप की ख्वाहिश
पतझड़ का रंग

सिकुड़ती त्वचा
नाराज होती प्यास
जुल्म करती साँझ

ऐसे में खिला पुष्प
जैसे कह रहा है
मेरी तरह महक

तन्हाई का क्या है
रंग ढंग जय न
कुछ यादों के संग

मुस्कुरा सफर तय कर
नहाकर नदिया में
मेरे संग लहरों में उतर

भूख तुडफुडा रही थी
नयन नम हैं ..
और तेरा अहसास जिन्दा

गगन के उस छोर
एक सितारा तन्हा इंतजार
टूटता रहता है दूजा इधर

आंसू गिरने से डरते हैं
तस्वीर न धुंधला जाये कहीं
और एक मुस्कान होठो पर

नश्तर भी मीठा था तुम्हारा
जुदाई कसैली सी लगती है
और याद कॉफ़ी मेरी तलब

मुझे चस्का लग चुका
मन को स्वाद भा गया
और दिल को तुम ||
---------- विजयलक्ष्मी

ये वैश्विक नव कलैंडर वर्ष है यारो ,

ये वैश्विक नव कलैंडर वर्ष है यारो ,
कहानी है कलैंडर बदलाव की
जाम छलक गिरे गिरेबानों में
याद किसे है, मिले आजादी पर घाव की ।

बुरा वक्त था या गुलामी रच गयी लहू में
सच कहना दर्द रिश्ता रहा लम्हा लम्हा
खिलेगा गुल कोई किसी पल महका सा
या दोहराएगा फिर कहानी पुराने घाव सी |

फिर वही आग बिखरी है सडकों पर
फिर वही खंजर पैने होते दिखे मुझे
ख्वाब समझूं या हकीकत .. क्या कहूं
जख्म दुखा सौ गुना देख दुश्मन लश्कर लाव की |

जो छिडक रहा था नमक मेरा ही हाथ था
जिनकी आस्तीनों में छिपा नश्तर साथ था
मैं ढूंढता रहा अपनापन सीने में छिपा
जानता नहीं था उसको मेरी ही मौत की ताब थी |
 
---- विजयलक्ष्मी