Wednesday, 1 January 2020

"सोचो ,क्यूँ हैं कांटे संग गुलाब के ,

"सोचो ,क्यूँ हैं कांटे संग गुलाब के ,
कैसा खालीपन है बिन इन्कलाब के ?
मंजिलों की राह आसां नहीं होती 
क्यूँ सूनापन रोता है बिन सैलाब के ?
रिश्ता रूहानी बे-सबब खूब हुआ 
क्यूँकर सिमटी दुनिया बिन ख्वाब के ?
शून्य पसरा क्यूँ समन्दर के खारेपन सा
कमल खिलता कब है बिन तालाब के ?" 

------- विजयलक्ष्मी
.
जीना सीखने के बाद भी आहत आहट रुला जाती है ,,
जिन्दगी अहसास के फूल पलको पर खिला जाती है ।।   ---- विजयलक्ष्मी


इश्क औ गम का रिश्ता भला रिसता क्यूँ हैं ,,
मुस्कुराकर इश्क की चक्की में पिसता क्यूँ है ||    --- विजयलक्ष्मी































नम मौसम को बदलती है उमड़ते अहसास की गर्म चादर 
 ,,
जिसे ओढकर अक्सर मातम भी खुशियों का राग सुनाता है।।  ----   विजयलक्ष्मी




और मुस्काती हूँ बैठ ख्वाब के हिंडोले मैं ,,
रच बस मन भीतर पुष्पित रगों के झिन्गोले में | 
विजयलक्ष्मी

मुझे चस्का लग चुका

सर्द भोर का सूरज
तपिश तो देता है
छोड़ जाता है एक ठंडापन

ठिठुरता अहसास
धूप की ख्वाहिश
पतझड़ का रंग

सिकुड़ती त्वचा
नाराज होती प्यास
जुल्म करती साँझ

ऐसे में खिला पुष्प
जैसे कह रहा है
मेरी तरह महक

तन्हाई का क्या है
रंग ढंग जय न
कुछ यादों के संग

मुस्कुरा सफर तय कर
नहाकर नदिया में
मेरे संग लहरों में उतर

भूख तुडफुडा रही थी
नयन नम हैं ..
और तेरा अहसास जिन्दा

गगन के उस छोर
एक सितारा तन्हा इंतजार
टूटता रहता है दूजा इधर

आंसू गिरने से डरते हैं
तस्वीर न धुंधला जाये कहीं
और एक मुस्कान होठो पर

नश्तर भी मीठा था तुम्हारा
जुदाई कसैली सी लगती है
और याद कॉफ़ी मेरी तलब

मुझे चस्का लग चुका
मन को स्वाद भा गया
और दिल को तुम ||
---------- विजयलक्ष्मी

ये वैश्विक नव कलैंडर वर्ष है यारो ,

ये वैश्विक नव कलैंडर वर्ष है यारो ,
कहानी है कलैंडर बदलाव की
जाम छलक गिरे गिरेबानों में
याद किसे है, मिले आजादी पर घाव की ।

बुरा वक्त था या गुलामी रच गयी लहू में
सच कहना दर्द रिश्ता रहा लम्हा लम्हा
खिलेगा गुल कोई किसी पल महका सा
या दोहराएगा फिर कहानी पुराने घाव सी |

फिर वही आग बिखरी है सडकों पर
फिर वही खंजर पैने होते दिखे मुझे
ख्वाब समझूं या हकीकत .. क्या कहूं
जख्म दुखा सौ गुना देख दुश्मन लश्कर लाव की |

जो छिडक रहा था नमक मेरा ही हाथ था
जिनकी आस्तीनों में छिपा नश्तर साथ था
मैं ढूंढता रहा अपनापन सीने में छिपा
जानता नहीं था उसको मेरी ही मौत की ताब थी |
 
---- विजयलक्ष्मी

Monday, 11 November 2019

" देव दीपावली "

त्रिपुरारी पूर्णिमा ...
शिव का त्रिपुरारी स्वरूप ..व .. देव दीपावली .. की बधाई ..
तारकासुर का वध शिव-पुत्र कार्तिकेय जी ने किया था .. उसी तारकासुर के तीन पुत्र थे ,, पिता की हत्या से दुखी उनके गुरु ने उन्हें ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करने के लिए कहा .. जिससे वह अमर होसके .. तब तीनो ने तप किया तथा ब्रह्मा जी से से वरदान माँगा जिसपर ब्रह्मा जी ने असमर्थता जताई तब उन्होंने बहुत अजीब सा वरदान माँगा जिसमे उन्होंने तीन नगरियाँ बसाने की बात कही ,, जिसमे बैठकर वह सभी लोको का भ्रमण कर सके तथा उनके एक सीध में एक आने पर एक ही तीर से तीनो की म्रत्यु जो देव कर सके उन्ही का हाथो म्रत्यु सम्भव होने का वरदान माँगा ,, ब्रह्मा जी ने उन्हें यह वरदान दे दिया ,... तब उन्होंने " मय " को तीन नगरी बनाने के लिए कहा गया ,
तारकासुर के बेटों ने क्रमशः
" तारकाक्ष की स्वर्ण पुरी ,,
कमलाक्ष ने चांदी की पुरी और
विद्युन्माली की लौह-पुरी बनाई गयी .तथा उन्हें वहां का राजा घोषित किया .. इस वरदान के कारण तीनो स्वयम को अजेय और अमर मान बैठे ..तीन पुर के राजा होकर ये त्रिपुरासुर कहलाये गये ..इनके उत्पात से देव मानव सब परेशान थे ..इन्होने देवताओ के साथ युद्ध कर बेदखल करके उनकी सम्पूर्ण सत्ता प्राप्त कर ली ,, देवताओं को घर से बेघर कर दिया तब सभी देव भगवान शिव की शरण में पंहुचे ,, शिव जी को प्रसन्न किया | देवो ने सम्पूर्ण व्यथा क्रमानुसार भगवान को सुनाई ..तत्पश्चात सहायता करने की बात कही ..प्रभु शंकर देवो की सहायतार्थ तैयार थे .... किन्तु दिव्य रथ की बात कही ..जिसके अनुसार सूर्य एवं चन्द्र को पहियों में लगना था ...इंद्र वरुण यम व् कुबेर को घोड़े के स्थान पर ..हिमालय धनुष हुए और शिव रूप स्वयम तीर बने ..अग्नि देव को तीर के अग्रिम नोक पर विराजित किया ...तब इस दिव्य रथारूढ़ शिव युद्ध के लिए उद्यत हुए ..तीनो भाई युद्ध के लिए ललक पड़े ... विनाशकाले विपरीत बुद्धि ... युद्ध रत हो भूल गये की तीनो एक सीध में आने पर मारे जा सकते हैं ... लम्बा युद्ध था अंतत: जैसे ही तीनो एक के पीछे एक हो पंक्तिबद्ध हुए शिव ने बाण छोड़ दिया ... ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार तीनो पुरियों समेत तीनो भाई भी धराशाही हुए ...देवों ने शिव स्तुति की तभी से शिव का एक नाम त्रिपुरारी पड़ गया ...
शिव की नगरी काशी में इसे दीपावली की तरह ही दीपों को प्रज्वलित किया जाता है ..|
त्रिपुरारी ..अर्थात तीन पुरियों के अरि ... शिव |
यह नाम कार्तिक पूर्णिमा केदिन ही पड़ा था शैव इसे बहुत मनोभाव से मनाते हैं |
अन्य पुराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु में मत्स्य अवतार धारण किया था था पृथ्वी की जीवन रक्षा की थी |
इसी दिन सिख सम्प्रदाय केप्रथम गुरु ..गुरु नानक देव जी का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है ... |
---- विजयलक्ष्मी