राह ए वफा के दर्द नगमा ए मुहब्बत सिखा गए , नजरों से मिल उन्हें भी वफ़ा ए मुहब्बत सिखा गए .
रूकती नहीं नजर कहीं अब जहाँ पर तुम न हों , बस में नहीं खुद के क्यूँ वफा ए कसम दिला गए . अहसास दिल से तेरे दिल से जाते नहीं हमारे , बे वक्त बे मौसम क्यूँ नगमा ए मुहब्बत सुना गए .
क्या ख्याल दूँ तुम्हे मैं अब तुम्हारे ही ख्याल से, राह ए वफा में इल्जाम ए बुतपरस्ती लगा गए .
जानेगें क्या तुम्हे ,हम खुद को ही भुला बैठे हैं , होश आने न पाया मुहब्बत ए काफ़िर बता गए .
गुल तो खिले चमन में मेरे अंजुमन में बहारें नहीं, दरकार जिंदगी की थी ,हमें सजा ए मौत सुना गए.
शिकवा नहीं किसी से खुद से ही हैरान हूँ मगर , क्यूँ जिन्दा हूँ अब तलक खुदारा बुत बना गए .--विजयलक्ष्मी
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