Saturday, 30 June 2012


इन नैनों में जाने कितने सपने तिरते हैं ..
जीवन को देखने के करीब से जीने की ललक के चलते
आसमां पर छा जाने के,हवा से बात कर बह जाने के
तूफ़ान से टकराने के ...कुछ कर दिखाने के ..
सबको अपना बनाने के ,धरा को स्वर्ग सा सजाने के ...
ख्वाबों को सच कर दिखाने के ..
अब सुन मेरे सपनों का सच क्या है ....
मेरी नहीं अपनी सोच ..
अपनी वंशबेल की सोच ..
घर की किलकारी की सोच ..सूने हुए आंगन की सोच
अपनी महतारी की सोच..बिछिये पायल की लयकारी सोच
दहेज की लाचारी की सोच ..धन की लाचारी सोच
पुरुष हुआ बिन नारी सोच..
कैसे जिन्दा रहेगी दुनिया सोच ..
सोच अब अपनी सोच की सोच
क्या फिर संसार बचा पायेगा ?
क्या दुनिया चला पायेगा ..
अपने ही अस्तित्व को बचा पायेगा
........
अगर हाँ ..तो मार डाल मुझे क्यूँ जिन्दा रहने का हक दिया ?
दुनिया देखने का हक नहीं मुझको ..
इन आँखों में ख्वाब क्यूँ सजे फिर
मुझे कोख से मत निकाल
खुद से कर विचार और कर डाल
.......... कन्या भ्रूण हत्या .......
.......जीने का अधिकार नहीं .......
......फिर तेरा भी संसार नहीं .......--विजयलक्ष्मी
 

No comments:

Post a comment