Tuesday, 25 September 2012

ख्वाब ले चले हम संग ,

मुस्कराया जाये सहर के सूरज की मुस्कुराहट के संग .
बिखेरे जाएँ धरा पर कुछ इन्द्रधनुष से खूबसूरत से रंग .
रंगीन हों जाये कायनात सारी क्यूँ बहे दरिया उदासी की .
प्यास का क्या है उठने दो कुछ बहक यूँही लहरों के संग .
सहर ए सफर है चल गुनगुना लेते है गुमनाम से गीत .
कुछ गगन के कुछ धरा की खातिर,ख्वाब ले चले हम संग .
आओ मुस्कुराये की मुस्कुराने लगे ओस सी तहरीर गुलों के संग .-- विजयलक्ष्मी 

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