Monday, 17 September 2012

दर्द है ..खुशी के कुछ पल ..

मुखौटों की  ही दुनिया है ..
हर और देख तो ज़रा 
मेरे चेहरे का सच किसी को रास भला क्यूँकर होगा ..
सबके पास चेहेरें और मुखौटे है ए सच ही तो है 
सभी जिसकी जो पसंद वाला मुखौटा चढा लेते हैं 
कोई मक्कारी का कोई फितरती का 
कोई दोस्ती का कोई भ्रष्टाचारी है मगर ईमानदारी का मुखौटा लगाकर बैठा है 
मेरे मुखौटे में क्या खराबी है तू ही बता ...

एक मुस्कुराहट है, दर्द है ,खुशी के कुछ पल है
मैंने किसी का कत्ल तो नहीं किया ...
कोई फिर भी मरना चाहता है तो मेरा मुखौटा उतरता भी है
ये जिंदगी है शयद बिना मुखौटे के जिंदगी तुम जिंदगी भी नहीं हों
तुम्हारे बिना ए मुखौटे !बता मेरी पहचान भी क्या है.- विजयलक्ष्मी 

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