Monday, 17 September 2012

बर्फ ने लील लिया पांतो को ..

इस उजड़े चमन में ,बहार आई थी कभी.
दरख्त सूखे न थे ,पाँते भी रंग लाये थे कभी .
खिलते थे फूल कई रंगों के ,हाँ बहार भी लजाई थी कभी .
थी गुंजार भौरों की ,गीत पंछियों ने भी गाये थे कभी .
आज बदला है रंग तकदीरों का ,मिजाज सूरज सा जलता है अभी.
रंग तो लाल है अब भी धरा का, धारा लहु की बहायी थी कभी .
हरियाली गहर गयी काली घटा में ,बर्फ ले लील लिया पांतों को|.
छीन कर वक्त ने हंसी लबों की , बंजर धरती बनाई थी तभी .- विजयलक्ष्मी 

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