Thursday, 6 September 2012

मौत पक्की थी मौत लेकर ...

उतार फेंको अब गद्दी से ,जुगाडदारों को क्यूँ सम्भाले हों 
पिछले दरवाजे से घुस चुके है उन्हें भी धक्का देदो ,
पहचानों, मार डालो , जो अपनी औकात भूल बैठे है,
हिमाकत कैसे हुयी कैसे ,कोई जयचंद होगा घर में ,
या विभीषण जो अपना उद्धार चाहता हों धरा पर ,
मौत ने परचम लहरा दिया ,अल्टीमेटम मिला बर्बादी का ,
शिखंडी भी छिपकर वार करता है ,सामने आ लम्बाई बता दूँ ,
भुनगा सा चिढता क्यूँ है ,न मालूम किसका क्या खाया लेकर ,

हम अनजान रही थे अपनी डगर ,बुलाया क्यूँ आवाज देकर ,
सुन ली तो चैन नहीं न सुनते मौत पक्की थी मौत लेकर ,
मिलन की चाह भला क्यूँ ,न देखा न सुना भाला है कभी ,
झूमते थे पवन संग जब खोए कैसे भला अच्छे थे तन्हा थे जब ,
रोते है , हंसते है ,मेरी मौत के फरमान पे दस्तखत भी हुए अब ,
अहसास ए मतलबपरस्ती हुआ आज क्यूँ है,कौन सुनाएगा कथा,
इंसान जाने ,बेचैन है, मन डूब गया समन्दर से खारे जल में यथा.- विजयलक्ष्मी

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