Friday, 14 September 2012

मगर ...

चाँदनी अहसास रात्रि के आगोश में खोने चाहिए मगर ..
क्षितिज पर धरती गगन मिलने चाहिए मगर ..
नदियाँ गिर के समन्दर में सूख जानी थी मगर ..
मिठास नदियों की नदियों से समन्दर को मीठा करती रही मगर ..
किरणपुंज नित प्रति धरा को रोशन करे है मगर ..
छिपता कहाँ धरा पर सूरज रहता है कहीं न कहीं मगर ..
नफरत के द्वार प्रेम ...दुःख सुख से पहलू जिंदगी के नाम है मगर ..
चल पड़े भी गर कदम यूँही मंजिल ए दरमियाँ मगर ..

जिंदगी का सफर सफर हर अहसास संग रहे भी मगर .....
वक्त की रफ्तार कोशिश कर भी लो मगर ..
चल बता जरा सोच कर ..आखिरी साँस हैं कहाँ ..मगर
सड़क चलती एक... छोर दो क्यूँ मगर ..
दो पाट इक नदी के संग ही चले ,अहसास की तरंग संग संग ही बहे मगर ..
बंद कपाट घंटियाँ क्यूँ गूंजती बता ...
दीप प्रज्ज्वलन शांति दूत रूप आग चाहिए मगर ..
हाँ मशाल चाहिए पथ प्रदर्शन के लिए ...फिर भी संग माचिस चाहिए मगर ,
उन्वान या इहलाम कोई दर्ज तो करो ...ढूँढता इंसान इंसानियत मगर ..
ख़ूबसूरती देह की ढहती दिखी उम्र दर ..बढता है मन का सौंदर्य क्यूँ मगर ..
राज है छिपा जो जिसमे वो उसी का जवाब है ...
आब के संग आग चाहिए तो आग संग आब की ताब है मगर .- विजयलक्ष्मी

No comments:

Post a comment