Wednesday, 11 July 2012

मिडिया बिक चुका क्यूंकि ..

अखबार सब पढते है यही सच है ,
खबरों का असर होता है अलग सबपर ,
किसी को रोटी की चिंता किसी को मुनिया की शादी 
नौनिहालों का देखकर रोटी नहीं क्या आंखे ,
स्कूल विद्यालय बंद होने की कगार पर है
रो रही है शिक्षा अभी बाढ़ ,कभी फंड की कमी को 
सरकार को चाहिए जेल नई और खुलवादे,
पुष्प कैसे खिलते उपवन मैं ,कोई कहता है पैसों की बर्बादी ,
किसी की छान उडती है तूफ़ान से, कोई दीप दिखाता है रास्ता
वेदना खड़ी दर पे आंसूं बहाती है ,
गीत रीतों के हर पल गुनगुनाती है ,
जरा अब सोच कर देखो रूहों के असर को भी .....
जिसे खुदा के पास भेजेंगे कहेंगे, हलफनामा तुम्हारा था लिखा है नाम जिस पर ,
शिव को परीक्षा लेनी थी मगर ...अमृत भी पिलाया था ...
ये अलग सी बात वही फिर आततायी बन के आया था,
लहू की बात ,बहने दे नयनों से ढलक कर ,
अखबार सब पढते है यही सच है ,
खबरों का असर होता है अलग सब पर ,
क्या इससे देश की हालत मैं सुधार की सम्भावना है ?
मिडिया बिक चुका क्यूंकि .--विजयलक्ष्मी 

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