Saturday, 28 July 2012

दास्तान ए अखबार ...

दास्तान ए अखबार --
आज रविवार मतलब बंद ,
सरकारी दफ्तर मौन है ,वैसे भी कौन काम होता है यहाँ खाना पूर्ति ,
घूसखोरी का बाजार चलता है , भ्रष्टाचार ही पलता है ,
मगर अखबार क्यूँ नहीं आया अब तक ??
चिंता सी हों चली है अखबार की क्यूँ ..कुछ गलत कह दिया ?
लोगों का तो शगल है अखबार पढ़ना ..
कुछ फुर्सत से पढते है, कोई चोरी से पढने की ताक में रहता है.
किसी खरीद कर पढ़ने आदत है तो कोई मांगकर पढ़ लेता है..
सहर का अखबार ....
चाय की चुस्की के साथ ,घूमता सबके हाथ..
कुछ सनकी होते है चाय की नहीं जिन्हें अखबार की दरकार होती है ..
आखें चौखट पे टकटकी लगाये चिपकी सी रहती है..
जैसे चैन औ सुकूं कोई उठा कर ले गया हों ..
उफ्फ !कुछ चहलकदमी करते है अखबार के इन्तजार में ,
बचैनी देखते ही बनती है ..
कुछ बे खबर से सोये है ...जैसे चिंता ही नहीं क्या हों रहा ,
आज संडे.... मेल .....देर से पहुंचेगा या
छुट्टी करेगा मेरा अखबार वाला ये भी नहीं मालूम नहीं...
क्यूंकि इन्तजार तो मुझे भी है ..अखबार का हलाकि फुर्सत नहीं होती पर ...
आदत है ..हैडिंग ही मिल जाती पढ़ने को तो सुकूं आ जाता है ..
जैसे जान लौट आई हों ..शरीर में ,
ये अखबार भी ...कितनों का चैन लिए बैठा है ..क्या मालूम ?
मुझे तो अपना पता है बस ...हाँ अखबार तो चाहिए ही .
सोचती हूँ आज अखबार वाले को कह दूँ ,
डांटकर कर ही कहूँगी कि" अखबार क्यूँ नहीं भेजा "-- विजयलक्ष्मी

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