Wednesday, 25 July 2012

खुदाई नियामत को कोई क्या जानेगा ..

आँख का आंसूं गिरता भी कैसे अटका है गगन के छोर में ,
रूहानियत बात ही अलग है ,खुदाई नियामत कोई क्या जानेगा .
लिख दी पाती सावन बन बरसता है बिजली तूफ़ानी असर देती है ,
सत्य का सत्य होना भी गुनाह झूठ का पर्दा भी कोई क्या तानेगा.
सहर होने को है शिवालय के दीप जलेंगे अब ,शंखनाद होना है ,
बरखा सावन की , सूरज का आगाज दिन उजाला सा,अँधेरा भागेगा .
इंसान बनना ही बाकी है सूरत ए हाल है ,बुत बना डाले हम सरीखे ,
जान डालकर भूल न की ये रहनुमाई ऊपर वाला ही बस अब जानेगा .विजयलक्ष्मी

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