Tuesday, 24 July 2012

सूरज की विदाई तलक ..

इकरार ए सकूं को क्या अब ढोल बजाऊँ बता ..
खुद के भीतर देख हम जिन्दा है कहाँ तलक ..


मेरी मौत की दुआ करना निगहबानी में अपनी ,
कुछ और नहीं कंधें नसीब होंगें कुछ दूर तलक ..

मातम नहीं है यहाँ मगर सन्नाटा तो है देर गए ,
जिन्दा न रहूँ अच्छा होगा,सूरज की विदाई तलक ..

दरकार ए दीदार सहर के साथ होकर खत्म कहाँ है ,
आखिरी साँस के गुजर होते , रह बसर गए तलक..

अंजुमन की ख्वाहिश क्यूँ हों बता आज तू मुझे ,
सत्य है बसर है बस बाकी सुर्य के खिले तलक .--विजयलक्ष्मी

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