Wednesday, 19 June 2013

जननी को त्रास प्रभु क्यूँ न हो नाराज


हालात अच्छे नहीं है ..बहुत बुरा है मंजर 
कुछ लोगो को कहते सुना है खुद के हाथ में खंजर 
सच है ठीक इसके विपरीत .. क्यूँ गाते हो झूठे गीत 
बहुत बदरंग किया है उसकी बनाई दुनिया को इंसान ने 
बेतरतीबी से नोचा है माँस..दिया है उसको त्रास 
फाड़ दिए हरित वसन ...उसपर उढ़ाया है हमने कफन
काट डाले अंग अंग ...लहू बहाया उसका देकर दरिया का रंग
उखाड़ डाले नन्हे शिशु धरा पर खेलते थे मौसम के संग
हरित वसना श्रृंगार छीन लिया ...कभी सोचा नहीं दर्द कितना दिया उसको
जननी को त्रास प्रभु क्यूँ न हो नाराज ..उन्हें तो करना है इन्साफ
रिश्तों की मर्यादा भी रखनी है .. धरती जितनी माँ हमारी है उसकी भी तो बेटी है ..
जिसने हमे जीवन दिया ..उसी को रौंदते चले ..भला फिर कटार क्यूँ न चले
क्यूँ न गरजे गुस्सा उसका ..क्यूँ फूटे आक्रोश ..
अरे ओ मानुष ...मान ले कहना ..समझ ले अभी भी वक्त है
गर तू अभी भी नहीं समझ पायेगा नहीं आत्मा को चेतायेगा
कर्म नहीं सुधारेगा ...माँ को नहीं सँवारेगा ..
सम्भल ...न मचल तेरा हश्र फिर क्या होगा
.- विजयलक्ष्मी

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