Tuesday, 4 June 2013

सिसकियों में भी तन्हा कोई नहीं रोता

हर कदम जिन्दगी का बढ़ता रहे यूँ ही ,
सफल हो जिन्दगी हर कदम पर यूँ ही .- विजयलक्ष्मी

सोचने का वक्त ही नहीं है जिन्दगी की शाम का अभी 
अक्सर बादलों की ओट से भी सूरज आता नहीं नजर .- विजयलक्ष्मी

तुम्हारे भेजे हर खत को वो पढ़ता है खोलकर ,
मेरे दर्द बताकर अपने बैठा लेता है तुम्हे रोककर .- विजयलक्ष्मी

कुछ कर्म लेख है कुछ हाथ की लकीरें ,
सिसकियों में भी तन्हा कोई नहीं रोता .- विजयलक्ष्मी

बेबसी भी होंगी मजबूरियां भी होगी कुछ ,
जिन्दगी की धारा किसी से मुह नहीं मोडती.- विजयलक्ष्मी


कुछ दीप जलाए थे उम्मीद के हमने भी देहलीज पर ,
रहती है नजर हमेशा उसी छोर जिन्दगी की दहलीज पर .- विजयलक्ष्मी
 

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