Tuesday, 4 June 2013

समन्दर सी मैं ....चाहकर भी प्यासी हूँ खारे जल में

जब कलम चले तो नमी आँखों में आ जाये अपनी उस अहसासों से ,
चलता है कविता सा जीवन मद्दम से उठते गिरते अंतर्मन के प्रयासों से 
गीत बनते है दर्द के दर्दीले से उठकर सांसों से 
जब बरसता है सावन आँखों से रिमझिम 
और रागिनी गाती है मद्दम सा सुर झंकृत होकर मन वीणा पर 
जब बीतराग सा कदम चल पड़े आहत सा आहट पाकर 
चटक धुप जब सुखा देती है जीवन की छाया 
और बेलाग लिपटता है दुर्दिन सा साया 
बहते है सुर मन के भीतर ही रिसकर 
और सजीले गीत रूठकर होठों से बहते है हवाओं में सुर लहरी से
गाती है प्रीत कहीं अंतर्मन में तड़प रागिनी तेरे मन की
और सुनाई देती है जर्जर सी आवाज कही कुए से आती
और डूबकर सूरज फिर लड़ता है खुद से
ढूंढता है उस उजाले को अंतर्मन के आने वाली सहर पर लुटाना है जिसे
और समन्दर सी मैं ....चाहकर भी प्यासी हूँ खारे जल में
उठते गिरते भावों की लहरों पर सवार किश्ती में बैठे तुम ..
और एकाकी सी एकाकी पल में संग तुम्हारे जीती हूँ प्रतिपल
ओ जिन्दगी !क्या तुम ही हो संग मेरे ?
पहचान हो गयी हो तो बता देना.....!
इस छोर पर हाँ ...मैं ही हूँ
.- विजयलक्ष्मी

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