Thursday, 26 June 2014

" तुम एक नदी और मैं सभ्यता .."



तुमने कहा था एक नदी हो तुम ,
और मैं एक सभ्यता ..जो जन्मी नदी के किनारे 
नदी के दूर जाने से बिखरने लगी ..
टुकड़े टुकड़े होती दिखाई देने लगी 
जिन्दगी बिखरती हुयी मिली चारो तरफ 
विश्वास नहीं हुआ न ..
देख लो ..
नदिया गदला गयी है सारी और इन्सान बिखर गये हैं 
शुद्ध जल पीने वाले दारू की बोतल पर मर रहे हैं 
धर्म क्षीण हो रहा है 
शिवालय को होटल बनाने का प्रपोजल चल रहा है
कुछ लोग अभी भी सूर्य को अर्घ्य देते है
लेकिन मालूम हुआ सूरज रोशन नहीं है जल रहा है
और सभ्यता ..बिखर रही हैं
पहाड़ से टकराकर बरसने से बदलो ने मना कर दिया है
कल मौसम विभाग की खबर थी बरखा के बादल मैदान में ही खड़े हैं
तुम्हारे इंतजार में नजरे दर ठहरी रही ..और तुम ..
आये तो सही लेकिन बिन शक्ल दिखाए चले गये
जैसे ..चाँद रात को देर निकले और आँख खुलने से पहले ही विदा हो जाये
फिर भी इंतजार के दीप जल रहे हैं ..
जानते हैं बहुत व्यस्त हो ..
हाँ मगर ..फिर नदी क्यूँ बने थे
हमे किनारे बसाया था तुमने ..
हमे वो किनारे रास आ गये हैं
टुकड़े टुकड़े ही सही ...मैं वही बसी मिलूंगी
मैं सभ्यता हूँ ...लोग कहते हैं मैं आधुनिकता से हार गयी ,
लेकिन मुझे ख़ुशी है ..मैं आज भी तुम्हारे ही तट पर बसी हूँ
यही घर है मेरा
तुमने कहा था एक नदी हो तुम ,
और मैं एक सभ्यता ..जो जन्मी नदी के किनारे
नदी के दूर जाने से बिखरने लगी ..
टुकड़े टुकड़े होती दिखाई देने लगी
जिन्दगी बिखरती हुयी मिली चारो तरफ
विश्वास नहीं हुआ न ..
देख लो ..
तुम एक नदी और मैं सभ्यता ..
हम जुदा नहीं हो सकते
तुम्हारे बिना मेरा वजूद कहाँ है ..देख लो --- विजयलक्ष्मी

2 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (27.06.2014) को "प्यार के रूप " (चर्चा अंक-1656)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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