झूले की उम्र में रस्सी पर लटकती है लडकियाँ ,
क्यूँ हर किसी की आँख में अटकती है लडकियाँ
लडकियाँ न होगी तो वजूद ही न होगा तुम्हारा
माँ बहन बेटी कितने रिश्तों में भटकती है लडकियाँ
ईमान औ जमीर जिनके मर गये बदनसीब है वो
खुशियों के सलीब पर भी लटकती है लडकियाँ
रंज औ गम न हो किसी को रो लेती है खुद में
खुशियों का चमन खिले क्यूँ भटकती है लडकियाँ
ये कौन सा उसूल है चुभा शूल की तरह
जिन्दा ही मौत की सूली लटकती है लडकियाँ
ये रंग कौनसा है ए समाज तू बता
कोशिशो के बाद भी क्यूँ रूह बन भटकती है लडकियाँ -- विजयलक्ष्मी
No comments:
Post a Comment