Tuesday, 3 June 2014

" फिर इस दुनिया को बचाकर करना भी क्या "





सोच रही हूँ इक खत लिख दूं 
खत में सब सच सच लिख दूं ..
और.. अपना डर लिख दूं 
कैसे इस जीवन पर हक लिख दूं 
माँ की ममता पर भारी या.... पिता पर कर्ज लिख दू 
मौत के घाट उतारी गयी जन्म से पहले का फर्ज लिख दूं 
अंगभंग नश्तर चाकू से करके कैसे गयी मारी लिख दूं
प्रताड़ना पिता की सुनती महतारी लिख दूं
औरत नहीं जिम्मेदार जिसकी वो गुनहगारी लिख दू
या लिख दूं खटकती है समाज की नजरों पर
या लिख दू भटकती हुयी नजर की बिमारी पर
या लिख दूं देह भेदती ..ताकू की धार सी नजर लार टपकती
या लिख दूं बचपन को भी करते तार तार व्यभिचार की कहानी
दहेज तो बात बाद की ब्याह तो भूली बिसरी कहानी बन जायेगा
नुची हुयी देह में साबुत मन कहाँ बच पायेगा ..
चारों तरफ भीतर तक भेदती नजरों का जंगल ही नजर आएगा
कैसे समाज की व्याख्या कर दी ..
जिसमे व्यभिचार की हामी भर दी गयी
नये कानून की अपेक्षा ..मेरी असुरक्षित जिन्दगी या मेरी सुरक्षा
सोचकर देखना ..अभी औरत के किरदार को ,,
कैसे मरती है आत्मा जब झेलती है बलात्कार को
जिन्दा देह भी बदबू देती है ...इन पशुओ के छूने के बाद
जिन्दगी होती है मौत से बदतर और बर्बाद
हवस के भेड़िये ..नोचते हैं ...और लटक जाती है तकदीर
लटकी है हर चौराहे औरत की तस्वीर ..
समाज में समाजवाद के मायने खत्म हैं
दर्द और जख्म से जीवन नर्क है
कानून धौंस जताता है मुह खोलने पर मुझे ही सताता है
मेरी उम्र ..का भी नहीं सोचता ..तुमने तो गलती कह दी
मेरी जिन्दगी लटक गयी है बेताल बनकर ..
हर चौराहे पर ..हर नुक्कड़ चौपाल के पेड़ पर
कोई विक्रमादित्य नहीं है ..जो बेताल को उतारे ..इन्साफ दिलवाए
इंसानी शक्ल में इंसानियत को इंसान से मिलवाये
क्या कोई है जो मुझे इन्साफ दिलवाए
मेरी आत्मा को प्रेतात्मा बनने से बचाए
मरे हुए लोगो को जिन्दा करे ..मेरी चीख दुनिया को जगा रही हैं
लेकिन जमीर को ..विश्वास को ..आस को ..जगायेगा
या चीखते ..चीखते ..यूँही .भटकती रहूं ..
स्कूल ,..गुड्डे गुडिया ..किताबे ..माँ के फटे आंचल में बेसकूं ..
रास्ते..गाँव की गलियाँ ,,टूटते ख्वाब
कहाँ सम्भालू ... कैसे सम्भालू ..बहते हुए इस नासूर को
लहू की बहती धार को ..
दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है जो
सोच रही हूँ ..एक आखिरी उपाय ..
क्यूँ न इस वंश बेल को कोख में ही मार डालूँ ,,
जानती हूँ ..मेरा वजूद भी खत्म होगा
दुनिया ही खत्म हो जाएगी ..
दुनिया ही खत्म हो जाएगी ..
फिर इस दुनिया को बचाकर करना भी क्या --- विजयलक्ष्मी




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