Thursday, 19 June 2014

" वक्त को भी नन्हा नन्हा काट दो ,"




वक्त का पहिया चलता चला गया 
मेरी मुट्ठी खाली थी ..
इन्तजार भी किया .."तुम मुडकर देखोगे "
किन्तु ..
तुम्हे नहीं देखना था ,
तुमने अपने हिस्से इन्तजार खत्म किया ही था 
और हमने ....शुरू किया ..
कुछ मिनट या सेकेण्ड ..बदल जाते हैं घंटो ,महीनों या युगों में ..
या ..समय बीतता नहीं जैसे थम गया हो 
हमारी आंख की कोर पर ..
घड़ी चलती है ...
किसी के लिए दौड़ती सी
सबकुछ पीछे छोडती सी
किसी को जैसे सबकुछ मिल गया
और रास्ता जिन्दगी का मिल गया हो
मंजिल के पथ पर फूलो भरा चमन खिल गया हो ..
और कुछ ...
सबकुछ लुटाकर आपही लुटे पिटे से बैठे हो
वक्त लौटता नहीं बहती नदी सा बढ़ता चला गया
और ...
छोड़ गया कुछ निशाँ निहारने को
वक्त पर हमने भी लिख दिता पैगाम ,
देर सबेर मिलेगा जरूर ..
इसी उम्मीद पर ,
सुना है उम्मीद पर दुनिया कायम है
शब्द रबर की तरह खींचते जा रहे है हम
कुछ पल भी द्रोपदी के चीर से बढ़ गये हैं ..
बढ़ते इंतजार को काटने का तरीका
वक्त को भी नन्हा नन्हा काट दो ,
जैसे ...गोया कोई दुश्मन है .
--------- विजयलक्ष्मी 

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