Wednesday, 18 June 2014

" खड्ग स्वाभिमानी लक्ष्मीबाई की लहराती हैं"



"स्याही से नहीं बनती आजादी की तहरीरे,
लहू से सींचकर ही ये पौध उगाई जाती है .

चाँद की तन्हा चांदनी रात लुभाती रही , 
हर सुबह सूरज से आँख मिलाई जाती हैं

हैसियत कुछ न सही मगर हौसला बहुत 
छोटी सी बदली भी जा पहाड़ से टकराती है

वीरानो को रंगते हैं हम नागफनी के पौधे 
उड़ती रेतीली आंधी कुछ न बिगाड़ पाती है

परतंत्र रेंगते रहने से तो मौत बेहतर है  
खड्ग स्वाभिमानी लक्ष्मीबाई की लहराती हैं"  
 -- विजयलक्ष्मी

3 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (20.06.2014) को "भाग्य और पुरषार्थ में संतुलन " (चर्चा अंक-1649)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. हैसियत कुछ न सही मगर हौसला बहुत
    छोटी सी बदली भी जा पहाड़ से टकराती है...

    परतंत्र रेंगते रहने से तो मौत बेहतर है
    खड्ग स्वाभिमानी लक्ष्मीबाई की लहराती हैं...ओजपूर्ण रचना बधाई...



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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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