Tuesday, 18 February 2014

"..... तुम्हारा अधिकार है तो "

अगर आईने पर तुम्हारा अधिकार है तो उसमे चमकते अक्स पर मेरा अधिकार है

माना होठ तुम्हारे है अपने अधिकार में मगर मुस्कान पर मेरा अधिकार है 


नजर तुम्हारी तुम्हारे अधिकार में होगी मगर नजर का इन्तजार मेरे अधिकार में है 


दिल तुम्हारा होगा तुम जानो मगर उसकी धडकनों पर मेरा अधिकार है 


देह बिफरती रहे यूँहीकहीं भी पड़ी ..नियंता आत्मा उसकी पर मेरा अधिकार है 


तुम ढूंढो रास्तों को मगर मुझे मालूम है उनकी मंजिल पर मेंरा अधिकार है 


तुम नफरत और नाराजगी जाहिर कर सकते हो दिखावे को,मगर उसकी हदों पर मेरा अधिकार है 


तुम बाँट लो कितना भी मुझको और खुद को ...यहाँ परिवर्तित होता नहीं अधिकार है 


तुम निशानदेही क्यूँ ढूंढते हो मेरी ,क्यूंकि तुम्हारी सोच पर मेरा अधिकार है 


मना कर ..कर दो ..तुम झूठ को सच बना दो ..इसे सत्य बनाने का मेरा अधिकार है 


क्या प्रमाण की जरूरत है ..तो खुद में झांककर देखलो ..जहाँ तुम्हारा नहीं मेरा अधिकार है ..-- विजयलक्ष्मी 

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