Tuesday, 5 August 2014

तिलिस्म हो जिसे टूटना भी गंवारा नहीं,

 "शब ए हिज्र का जिक्र भी करता है कौन ,
ये अलग बात है हमे इन्तजार बकाया है ||

शब औ गम में हम गुम हुए इसतरह ,
लौट गयी खुशियों का एतबार बकाया है ||

कब छप गयी तस्वीर मालूम न हुआ ,
यूँ हरफ हरफ बांचना हर बार बकाया है ||

तिलिस्म हो जिसे टूटना भी गंवारा नहीं,
सच की छाती पे झूठा इनकार बकाया है ||

जिन्दा हूँ जलकर भी कही अँधेरे में ,
रौशनी के बाद भी अन्धकार बकाया है || "--- विजयलक्ष्मी 

No comments:

Post a comment