Wednesday, 27 August 2014

"और मैं ....मुस्कुराती हूँ "

एक सच सुनाऊ ..
मनन करना तुम 
बताना क्या गलत हूँ मैं 
मैं जानती हूँ 
समझती हूँ तुम्हे 
और तुम 
तुम जीतना चाहते हो मुझसे ..
और मैं ...
मैं भी जीतना चाहती हूँ 
लेकिन ..तुम्हे ,
तुमसे नहीं 
तुम्हे हार पसंद ही नहीं 
और मैं ..
हाँ ...मैं हारती हूँ
तुम्हे खुश देखने के लिए 
तुम मेरी हार मुस्कुराते हो 
और मैं ..
मुस्कुराती हूँ 
तुम्हारी मुस्कुराहट पर 
और तुम ..
संतुष्ट करते हो अपने दम्भ को 
और मैं ..
बस "अपने प्रेम को "-- विजयलक्ष्मी 

4 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.08.2014) को "सामाजिक परिवर्तन" (चर्चा अंक-1720)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

    ReplyDelete
  2. wah ! hum striyan ye shayad hamesha hi karti hain...umda rachna

    ReplyDelete
  3. और मैं ..
    हाँ ...मैं हारती हूँ
    तुम्हे खुश देखने के लिए
    तुम मेरी हार मुस्कुराते हो
    और मैं ..
    मुस्कुराती हूँ
    तुम्हारी मुस्कुराहट पर
    और तुम ..
    संतुष्ट करते हो अपने दम्भ को
    और मैं ..
    बस "अपने प्रेम को "
    भावनाओं का सागर है आपके शब्दों में ! बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    ReplyDelete