Saturday, 30 August 2014

" ठहरो तो ...सफर पर हम भी हैं "

हवाओ की बात मत करना 
सरहद पर ठिठकती भी नहीं 
किरण सूरज की सरहद को देखती भी नहीं 
बादल अलबत्ता ..दीखते है गहराए से इस और 
समन्दर को बांध डाला तलवार की धार से 
कत्ल करना ही ठहरा कर डालो एक ही वार से 
बंजर खेतो को सींच सींच तुमने उपवन कर डाला 
इन फूलो के गहनों से सजना चाहती है हर बाला 
कुछ बीज मुकम्मल मिल जाते है 
जिनसे फसल उगा लेते हैं 
सच बोलू तो भी झूठ लगेगा
खाद अपने खेत की मिटटी में
थोडा प्यार थोड़े से कांटे
बिखरे अहसास बकाया सांसे
कुछ अरमान तुम्हारे दिल के
थोड़े राग हमारी महफिल के
रात की कालिमा ..सूरज की लालिमा
तारे चाँद सितारे तुम्हारे
पलको की दुनिया के ख्वाब रुपहले
खंजर वंजर चाकू वाकू
सब रखते हैं साथ सहारे
और जिन्दा सा ख्वाब ..
सजता है मजार पर मेरी महक महक कर
तुम्हारी रुनझुन सौगातो की आहटों को लेकर
ठहरो तो ... सफर पर हम भी है -- विजयलक्ष्मी 

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