Sunday, 17 August 2014

" आँखे देखती है मन छूता है "

जब सरगोशियों में होती हूँ मैं
मेरा मौन बोलता है ..मेरी आत्मा की आवाज बन
कैसा विरोधाभास ..पूर्ण विश्वास
क्यूँ पूछते हो तुम ..मेरे मौन की भाषा ..
आहत करती है ये बात ..
मौन का रहस्य ..
आँखे देखती है मन छूता है
पुनरुत्थान होता है अवचेतन से सोये मन का जागरण जैसे
सिमटा हुआ उग्र सौन्दर्य ..प्रेरित करता है
उस क्षण सबसे निकट रहता है वो तारा और मैं ,
खो जाता हूँ अशांत मन की ज्वार बनाती पीड़ा की लहरों पर सवार
पुष्पित होते पुष्प जैसे बयार चलती है मेरे भीतर
शांत दिखता है अशांत मन ,,
जहाँ समय के चक्र ने शब्दों को गूंगा बता दिया
आँखों में फैला हुआ मौन का सौन्दर्य प्रकाशित करता है अंतर्मन
तुम वही बैठकर मुस्कुराते मिले न होकर भी
जैसे नशा है और कदम बहकना चाहते थे ..
तुम्हारे साथ ..
मौसम भी चतुराई सीख गया
आँखों में बहती है निर्झरी मीठी बयार लिए झरने की जैसे
दर्द पर मरहम लगा कर समय भी छोड़ देता है
जो बाजार में मिलता है सकूं नहीं देता ..
एक झोंका सा बहता है विचार तुम्हारा लहू के संग
जैसे मीरा रहती हो कृष्ण के साथ
मन के आसन पर विराज
भावो की परिधि में चंचला होती तड़ित छूकर गुजरी जब
जैसे नजरे छूकर गुजरी हो ..सिहर उठती है खुद में ..
और मेरा मौन मुखर होकर गूंजता है
अबोले सन्नाटे के शोर में
थाम अशांत मन के घोड़े बेलगाम दौड़ते रहे जो
वो मधुर क्षण मदिर पवन के कांधो पर सवार..
स्वप्निल स्वप्न तिरा पलको में
जब सरगोशियों में होती हूँ मैं
मेरा मौन बोलता है ..मेरी आत्मा की आवाज बन
कैसा विरोधाभास ..पूर्ण विश्वास
क्यूँ पूछते हो तुम ..मेरे मौन की भाषा ..
आहत करती है ये बात ..
मौन का रहस्य ..
आँखे देखती है मन छूता है --- विजयलक्ष्मी


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