Friday, 15 August 2014

" हाँ ,ये भी सच है ."

" युद्ध करने की इच्छा
मर जाती है जब 
इंसान मरने लगता है
समझ लो 
मरना तो सबको है
एक दिन 
यह तो निश्चित हो चुका है 
जीवन नश्वर है 
संसार भी नश्वर है 
अपरिमित अहसास होते हैं 
आत्मा मिटती नहीं यही सुना है लेकिन ..
नहीं मिटी तो भटकती रहेगी 
गगन पर नीले रंग में 
देखेगी 
बिन नयन के पलके झपकाए
नदी पत्थर पेड़ सूरज आकाश धरती 
मैं और तुम ...
मर चुके लोग जिन्दा नहीं होते  
पीपल के पेड़ पर निवासी होते है क्या सत्य है ये 
क्या मुझे भी एक डाल मिलेगी रहने को 
नहीं न ...
बिलकुल नहीं ...भटकती आत्मा को ठिया मत देना तुम 
यही प्रायश्चित होगा .."मेरे प्रति तुम्हारा" 
और मेरी सजा ..तुम्हारे प्रति ..
मुझे ये भी मंजूर है 
इससे भी तुच्छ कुछ हो तो 
मंजूर है ..मंजूर है ..मंजूर है ".----विजयलक्ष्मी 

No comments:

Post a comment