Thursday, 27 March 2014

"..न हो कोई चिंगारी भडक उठे .."

आओ क्यूँ न इस रात फिर जलकर महक लिया जाये ,
पंछी तो नहीं हूँ लेकिन ...चिरैया सा चहक लिया जाये .

चाँद चल दिया चांदनी संग सूरज ओढ़ समन्दर सोया ,
तमन्ना बोल उठी ...तन्हा यादों संग बहक लिया जाये .

खनकते हुए अहसास बिखरे हैं नजारों में हर तरफ मेरे ,
छनकी है सुरलहरी ..मद्धम सी मदिर लहक लिया जाये .

राख के ढेर भी कुरेदने में लगा सुखनवर है या सरफरोश,
न हो कोई चिंगारी भडक उठे ... चलो दहक लिया जाये . -- विजयलक्ष्मी

5 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.03.2014) को "
    जय बोलें किसकी" (चर्चा अंक-1565)"
    पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. सुन्दर रचना।
    पढ़कर अच्छा लगा।

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  3. चाँद चल दिया चांदनी संग सूरज ओढ़ समन्दर सोया ,
    तमन्ना बोल उठी ...तन्हा यादों संग बहक लिया जाये .
    ye khas lagaa ...vaah

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  4. स्वागत है आप सभी का

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