Sunday, 13 October 2013

अगर दिल दिया होता ...



अगर दिल दिया होता और तुम मिल गये होते 

वक्त का आलम ऐसा न होता गुल खिल गये होते 

महक उठती सुबह शाम हमारी यूँ न रो रहे होते 
जो दीवाना कह गये अभी हमको यूँ न कह रहे होते 

बेरुखी उनकी दर्द दे जाती है तन्हाइयों के चलते 
जीते है उन्ही के साथ वरना अबतक मर गये होते 

न शऊर था नुमाया होने का न चुप ही रह सके
मुश्किल यही है हमारी ,पर्दे हया के न हट गये होते

झांकते न यूँ बंद खिडकियों से इस तरह हम 
करते सौदा औरो की तरह बेमोल न बिक गये होते .

आईने पर नजरे उठाते है साजो श्रृंगार की खातिर
अब देने लगा है धोखा ये भी तुम यूँ न दिख रहे होते.

- विजयलक्ष्मी

1 comment:

  1. नमस्कार आपकी यह रचना कल मंगलवार (15-10-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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