Sunday, 20 April 2014

"....भला कैसे !!"

कहो,हद ए जुनूं पर आके खाली लौट जाऊं ,भला कैसे |
वक्त ए सुकून को पाके खत उसके जलाऊ ,भला कैसे ||

बेरुखी उनकी रुलाती है और मैं रूठ जाऊ ,भला कैसे |
जो ख्वाब था हकीकत हुआ वो भूल जाऊ भला कैसे ||

इस दर्द ए दुनिया से रिश्ता ही तोड़ जाऊ ,भला कैसे |
बकाया ही कहाँ हूँ मैं औ तुम्हे भूल जाऊ ,भला कैसे ||

रंग ए वफा नहीं मालूम बेवफाई निभाऊ भला कैसे |
तुम बसे हो आदत की तरह, बदल पाऊ ,भला कैसे ||

रंग देखे हैं बहुत जमाने के यूँही भूल जाऊं,भला कैसे |
मंजिल दूर सफर लम्बा मैं घर लौट जाऊ ,भला कैसे|| -- विजयलक्ष्मी 

No comments:

Post a comment