Friday, 18 April 2014

" रो रो नैना सावन बन गये फिर भी न प्यास बुझे"

रिमझिम बरखा अंगना मेरे ,बदरा खूब सजे 
रज रज बरसे सावन सा मन संग हम भीगे 

न शोर मचा रे बदरा दिल मोरा काप उठे है
नयन पुलक बाढ़े मनमन्दिर गीत सज उठे 

ओ सावन तुम यूँ न बरसों मुस्काओ भर नैन
तुम संग भीगू कैसे सजन संग मन भीगे

ब्रह्मानन्द बने परमानन्द सांवरिया तेरी गली
गोकुल मथुरा मन मेरा बनया मुरूली सा बाज उठे

आओ सांवरिया दरस दिखाओ मन तरस गया
बैठ के अम्बर बदरा बनकर धरती सा भीगे

स्वर नहीं सजते साज टूट गये मनवीणा कमजोर हुयी
आओ प्रभु अब आ भी जाओ ...दरस न जाने दीखे

नयन भी बरसे प्रभु मन भी तरसे पुष्प बने है भाव
रो रो नैना सावन बन गये फिर भी न प्यास बुझे -- विजयलक्ष्मी 

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