Friday, 25 April 2014

" मुस्कुराहट की आहट पर कदमबोशी में पगी सी जिन्दगी"

वो मेरी थी जल गयी बस्तियां ,धुआं धुंआ सी जिन्दगी ,
उसकी तो दिल्लगी हुयी हमारी दिल की लगी सी बन्दगी .

लकीरें हाथ की पढनी नहीं आई उसकी पैरहन बनी लकीरे 
वाबस्ता जिस गली से थे जर्रे जर्रे से ही बंधी सी जिन्दगी .

दर्द ए बयार उठती लगी थी आज चमन के फूल गुमशुदा 
कलियों, तितलियों को बसन्त बसन्ती ढकी सी जिन्दगी .

हरजाई कह दूं अहले वफा को कैसे बेमुरव्वत है जमाना 
दर औ दीवार भी बन्दगी से बा-दस्तूर रंगी सी जिन्दगी .

गम ए राह में गुमराह यादें समन्दर की लहरों सी तहरीर
मुस्कुराहट की आहट पर कदमबोशी में पगी सी जिन्दगी .-- विजयलक्ष्मी 

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