Friday, 18 April 2014

" अब क्यूँ बैठा हैं तू , ...आँख में उजाले की आस लिए "




चल उठ अब प्यासे की प्यास का इंतजाम हो गया ,
मुहब्बत मिल गयी अजीज़ की तू बदनाम हो गया |

मापना था समन्दर तेरे अहसास का गहरा कितना 
उथला ही निकला तू भी ...गन्दला तालाब हो गया |

मैहर सूरज की हुयी तो .. इन्तजार करना सहर की 
अंधेरो से निकल मुंडेर हुयी सुनसान संसार सो गया|

अब क्यूँ बैठा हैं तू , ...आँख में उजाले की आस लिए 
घर पत्थर के हुए अब क्यूँ दिल से अहसास खो गया |

जिसके सजदे में ईमान गया तिरा.चातक हुआ मन
टिटहरी की चीख सुन उसका गुम आफ़ताब हो गया |
--- विजयलक्ष्मी 

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