Wednesday, 2 April 2014

तू वृक्ष बना था जब एक घोसला था मेरा ,,

कभी सूखे हुए तालाब का चेहरा देखा है !
उगते हुए सूरज का रंग सुनहरा देखा है !!

भूख भूखी नहीं मिली होगी तुम्हे कभी !
क्या प्यासे समन्दर को तरसते देखा है !!

हथेली पर रेखाएं हमारी खींच दी किसने ! 
लिखा हुआ मिटते यहाँ किस ने देखा है !!

तू वृक्ष बना था जब एक घोसला था मेरा !
महक ढूंढती हूँ वही किसने उड़ते देखा है !!

गिनती होती है मुहब्बत में मालूम नहीं !
शून्य हूँ मैं क्या तुमने भी शून्य देखा है !!.--- विजयलक्ष्मी  

No comments:

Post a comment