Tuesday, 8 April 2014

" सियासत की जरूरत से दुनिया बदलती है"

"भगदड़ 
शब्दों की ...
या भावनाओ की 
या अहसास की 
या उतरते चढ़ते हुए साँस की 
या बस मौत की आस की 
या जीवनभर के प्रयास की 
या टूटते हुए दर्द के साथ की 
या चीखते परिंदे की चीत्कार सी 
या खरीदते हुए खरीददार सी 
या फड पे लगे बाजार सी 
या दुल्हे पीछे चली बारात सी
या दुल्हन विदाई के बाद की
या इम्तेहान के बाद की
या खुशिया मिली जो आज की
या टूटते दिल की आवाज थी
या धडक उठी धडकन से नाद थी
या पन्द्रह अगस्त सी आजादी मिली
या गणतन्त्र से लगे संविधान की
या चुनाव के आगाज की
या जो कुछ उस अंजाम की
या नई दुनिया के दर यूँही खुले थे ..संगीत वाद्य सब बज उठे थे
या नये संगीत तुमको आदत नहीं अभी
या अदावत अभी पूरी हुयी ही नहीं
या कली कोई अब तक खिली ही नहीं
या और शातिर चील कोई मिली नहीं
या दोस्तों ने वजह ही छिपाली
या बताओ हकीकत न गयी तुमसे सम्भाली
या रिसने लगे है जख्म कुछ पुराने
या खो गये बरसाती शामियाने
या गुने नहीं गये तराने
या लहू पानी हो गया
या किसी की निगेबानी में खो गया
यूँभी सत्ता की सीनाजोरी चलती है
सियासत की जरूरत से दुनिया बदलती है"-- विजयलक्ष्मी

No comments:

Post a comment