Tuesday, 1 April 2014

जानते हो . मैं हूँ तुम्हारी "समझ "दब गयी हूँ...

सच लिख दूं 
हाँ ...बिलकुल सच 
लेकिन 
क्या ठीक है 
इतनी साफगोई
क्या उचित है ..सच कहना 
वो भी उन लम्हों का ...
जानते हो न तुम भी ,
इसीलिए ..
रुक जाती है कलम 
रुंध जाती है आवाज
बजने लगती हैं थाप
और
बरसती है निगाह
निकलती है आह
ये कैसी चाह
कैसा निनाद
कौन हुआ बर्बाद
वो ...
जिसने ख्वाब दिखाए
या ...वो
जिसने देख डाले
डूब गये उन्ही में
भूल गये सबकुछ
कितने खुश थे न
कोई मायूसी नहीं थी
एक दृढ़ता थी
एक विश्वास
एक अनुशाषित सा सच
स्वतन्त्रता भी थी
आवारगी भी थी
फिर भी सकूं था
एसी भूख नहीं थी ..और आज ..
हर कोई भूखा है ..
कहने को ..सब जिदा हैं
लेकिन
मर गया इंसान के भीतर का ..
चरित्र
जला दिया जमीर
तिलांजली देदी ..नहीं ..नहीं
तर्पण कर दिया ..आत्मा का ..
क्यूँ न करते ..
बहुत टोकता था
हर गलती पर रोकता था
और अब
...आजाद हूँ ...पूर्ण आजाद
मनमानी करने के लिए
तुमने भी तो मुहं फेर रखा है न मुझसे
लेकिन ..तुम तो मेरी तमन्ना हो ..
मैं नहीं छोड़ सकती
आखिर तुमसे वजूद बनता है
मुझमे ..अहंकार ,मैं ,हूँ अनंत होती भूख ..और ये तृष्णा .तुमसे ही है
और वो लूट रहे जनता को
लो ...राजनीती के मायने ही ..
झूठ और फरेब
गुंडागर्दी
घोटाले
भ्रष्टाचार
साम्प्रदायिकता
मारकाट
अलगाव
नक्सलवाद
धरनावाद
और फिर
लूटो ,लूटो ...और लूटो ..
और ...
एश करो .
यही है बस
नागरिक नहीं वोटर को जिन्दा रखो ..
वो तुम्हे जिन्दा रखेगा
यार ...पिलाओ ..झूठ की लाठी को तेल
जनता का निकालो तेल
वोट मिलेगी रेलमपेल ...
लेकिन ...
मैं ...हूँ आज भी बस
मृतप्राय सी
जानते हो . मैं हूँ तुम्हारी "समझ "
दब गयी हूँ...
आज की गंदी और भौंडी होती राजनीती के बोझ तले ... --- विजयलक्ष्मी

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