Wednesday, 23 April 2014

इन्तजार क्यूँ राहों पर जल उठे जगमगाहट के लिए

सरहद पर सीमा-प्रहरी थे सरफरोश हम सीना तानकर ,

सत्ता के भूखो ने ही कटवाए सर हमारे गुलाम मानकर .-- विजयलक्ष्मी





वतन पर मिटने की चाह हम सिरफिरों को सरहद तक लायी थी 
सरकारी हुक्मरानो की जिद... काटनी थी गर्दन जिसकी उसी से कटाई थी-- विजयलक्ष्मी





भटकते हैं लोग सरल सी एक मुस्कुराहट के लिए ,
खिले चेहरा, नजरे भी टिकी है उसी आहट के लिए .

दीप बना खुद को तेल से पूरित हो बैठे है साँझ से 
इन्तजार क्यूँ राहों पर जल उठे जगमगाहट के लिए.- - विजयलक्ष्मी

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