Friday, 18 April 2014

" मालुम है ये नंगा सच भी जनता को .."

खाद्य सुरक्षा ,क्या खूब कही ,
बर्बाद करदो हर मेहनतकश को 
खेत बेचो भुमिमफियाओ को 
कंगाल करते रहो भूमिहारो को 
जमी में बीज की जरूरत क्या है बंजर हो जाने दो 
किसी अडानी किसी वाड्रा को बेच देना कमीशन तगड़ा मिलेगा
सापेक्ष और निरपेक्ष की बाँसरी बजाते रहो ...ऊंट किसी करवट तो बैठेगा
लेखक से कलम ..किसान से जमी ,गगन से फलक छींनते लोगो ..
याद रखना ..हर कतरा चीखेगा लहू का मेरे ..
जब रसूल महसूल वसूल करेगा ...हर कत्ल हुए जज्बात का
मेरी कटी गर्दन तुम्हारे सामने होगी ...सत्य की लाश लिए
खेत चीखेंगे ...आसमान पर आवाज होगी ..तब कान बंद कर लेना अपने
बीज रोते मिलेंगे बिखरे राह में शब्द शब्द से टूटे हुए
क्या गिद्ध ..क्या सिद्ध ..व्यर्थ कर रहे हैं गंगा जमुनी तहजीब स्वार्थ के अर्थ में
हर शातिर भारी है सियासत की शतरंज पर
देश के लिए कोई नहीं मरने को तैयार ...आमादा हैं मिटने को शतरंजी खेल पर
प्रेमचंद को मालूम था शायद ये भविष्य का सच ...आईने में बो गये थे .
हम मजदूर की देह और हथियार जंग लगाने की जुगत में लगे हुए लोगो ..
कितना उधारी डोगे ..फिर से ..गुलाम बनाने की तैयारी पूरी है तुम्हारी
तुम देश के राजा हो बुर्के की हकीकत जानते हो ..
देखना है ये बुरका कब खींचा जायेगा ...भीतर छिपा चेहरा कब सामने आएगा ..
और एक नया इल्जाम चस्पाया जायेगा ..
जब तक शहंशाह की नजरे इनायत हैं उतनी ही जिन्दगी ,,
फिर ...फिर वही खल्लास पुरानी तर्ज पर ,,
और खबर अखबार में छपेगी ..काली स्याही से पुती तस्वीर लिए ..
मालुम है ये नंगा सच भी जनता को ..
दुआ में क्या मांगूं अब ?..पर्दा या हकीकत की लम्बी उम्र !!.--- विजयलक्ष्मी

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