Friday, 3 August 2012

कैक्टस में फूल जरा देर से खिलते हैं ..



कहा था कैक्टस पर फूल जरा देर से खिलते है ,
मगर खिलते लाजवाब है ये भी सच है ,
सजे माफ़ी का रंग लेकर आ जाते है दुनिया मैं 
दोस्ति के रंह को भी मेहरबाँ बनाते हैं ये ..
कांटे तो रग रग में होते है सच है ये ...
मगर सहरा में प्यासे पंछी को जल पिला

ते है ..
खुद दर्द उठाते है और मर भी जाये तो गम नहीं
हर रिश्ते को फिर आखिरी दम तक निभाते हैं ..
कदम उठते नहीं जाने क्यूँ तलब के बाद भी इनके ,
प्यास सहरा की बहुत जालिम सी होती है ...
मृगतृष्णा नैनों को जल ही जल दिखलाती है ,
कहीं दूर ..नखलिस्तान है सहरा में ,


गुजरती हवा ये बताती है..
बरसता है अमृत कण आसमानों से ..बादलों की घनी ओट से झांकता है चंदा भी ,
इन्तजार में जैसे किसी चकोर के ,
चुप देखते देखते छिप जाता है फिर से ...
नींद की गोद में सहर के इन्तजार में ..
और शब्द बिखरे से है जैसे नाराज से है ..
बांध कर भेज दो उन्हें ....खटखटाते से दरवाजा चुप कैसे हुए ...
ये चुप्पी रास नहीं आती ...शब्द बोलते अच्छे लगते हैं मुझे तो ...
कुछ गुनगुनाते से ,मुस्कुराते से ,दर्पण को सकुचा कर निहारते से ...
कैक्टस युम और भी रंग भरता है खुद में ..
रंग देता है जब खिल जाया है जिस किसी भी उपवन में ...
कांटे भी सुहाते है मगर सबको नहीं ,
है जो कैक्टस को फूटी आँख देकर राजी नहीं है ...
क्यूँ किसी की जिंदगी में कांटे हों ..शायद ये ख्याल रोकता है
मुस्कराने को ...रंगत वही हों जाये चमन की तेरे सोच ले ....
सब को अपना रंग दे देता है ...बताना ...सम्भावनाएं कितनी है ये जानकर. - विजयलक्ष्मी

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