Tuesday, 21 August 2012

कश्ती से भेंट जाता है ..





निकहत ए गुल गुलशन की आकर देख जाता है ,
कभी नदिया कभी अम्बर, कश्ती से भेंट जाता है .

सुरों के बीच आकर भी गुनगुनाना भूल जाता है ,
मौसम सर्द हों कितना ,पतझड सा छेड जाता है .

पहाड़ी झरने सा गिरकर ,नदी सा गहर जाता है ,
थर्राता है समन्दर सा,और चातक सा टेर जाता है .

जमीं जंगल की, मुहर खेत की सरकारी चाहता है ,
 उठाना चाहता तुफाँ ,खुद ख्वाबों को बेच आता है.

पैमाइश ए जमीं ,क्यूँ उसपे अश्कों को गिराता है,
तपिश सूरज,तमन्ना चाँद,पौधों को देख जाता है.

- विजयलक्ष्मी

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