Friday, 3 August 2012

झूठ की नीव कमजोर होती है ...


सत्य तो सत्य रहेगा पर्दों में छिपा क्या ,
झूठ की नीव कमजोर होती है .
अभी इमारत गिर जाये तो भला ,
फिर मौत मिले न और जिंदगी भी तोड़ देती है..
किश्ती का सत्य है उसे तो डूबना
देखना है अब तो ...
जिंदगी की कितनी लम्बी दौड होती है ..
धंस जाये जमीं में आज ही अच्छा है ..
चन्दन खुशबूं औ शीतलता छोड़ता है क्या..
रहने को उस पर भुजंगों की होड होती है ...
देश का चरित्र है अपना भी तो कुछ ...
दरारों का काम अपना है ..
रौशनी बिखेर बताने की दरकार होती है ..
सिक्के खोने लगे... घिसेंगे ही चलेंगे गर ,
कलदार चौराहे पर यूँ नहीं नीलम होती है..
धनिकों की तिजोरी में रही अब तक ..
उठ गया अन्ना भी टूट कर या बिफर कर वक्त बताएगा अब ,
आज तो लगता है आन्दोलन टूट गया सब कुछ छूट गया
और जिंदगी तू भी ...
सरे बाजार ...लगता है.. नीलाम हों रही है .
हश्र ए वतन सोचे क्या अब ..??. - विजयलक्ष्मी

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