Tuesday, 28 January 2014

सूरज हूँ न चिंगारी हूँ फिर भी जलना सीख रही हूँ मैं .

होने दो भीड़ यहाँ जितनी तन्हा चलना सीख रही हूँ मैं ,
सूरज हूँ न चिंगारी हूँ फिर भी जलना सीख रही हूँ मैं .

जितने भी घट थे मौसम में रीते सब के सब मिले रीते,
प्यास बढ़ी बदरा को देखा जल भरना सीख रही हूँ मैं .

जीवन को कूप बनाने वाले बारिश का मुह तकते हैं,
सागर सा लहराकर खुद को भरना सीख रही हूँ मैं .

छाँव बिकी बाजारों में जलते हैं रेतीली जमी पे पाँव मेरे ,
रात अँधेरी बहुत घनेरी लेकिन चलना सीख रही हूँ मैं .

सच की आग नफरत की नदिया खूब मिली बहते बहते
फूल नहीं शूलों पर चल पर्वत पर चढना सीख रही हूँ मैं.- विजयलक्ष्मी

No comments:

Post a comment