Friday, 3 October 2014

" क्या कभी अपने सपनों के हिन्दुस्तानी की सोचा है ...."

 " गाँधी के सपनो का हिंदुस्तान ....
क्या कभी अपने सपनों के हिन्दुस्तानी की सोचा है 
अपने तो सपने भी नहीं मालूम किस रंग के हैं ,फिर पूरे करने की बात छोडिये 
दुसरे की आंख के सपने तब पूरे होते है ..अपनी आँख के सपने मर जाये पूरे न हो सकते हो या ...देखने के काबिल ही न रहे हो 
क्यूँ क्या आपने कुछ और तरह का भारत चुना है सपने में 
सुंदर सलौना उन्नत भारत नहीं देखा कभी
युग गुरु भारत का ख्वाब नहीं देखा कभी ,
अपनी स्वार्थबेल से फुर्सत मिले तो सोचोगे न
अपने पैर ठोस धरातल पर धरो तो सोचोगे न
स्व से उपर उठोगे तो सोचोगे न ..
कोई सपना अपनी आंख मे पालो
उसके भीतर के खोट निकालो और हो जाओ तैयार ,,
कोई गाँधी नहीं कहेगा आकर ये मेरे सपनों का भारत नहीं है ,,
लेकिन ..
कदम सुभाष सा उठाना होगा ,
भगत सा फांसी पर चढाना होगा
आजाद सा आजाद होना होगा
गाँधी का त्याग ,,जनता का साथ पाना होगा ..
अपनी आँख के सपने में स्वाभिमान को इन्द्रधनुष के पंख लगाना होगा
हर आँख मुस्कुराए जिसमे ,,हर माँ खिलखिलाए जिसमे
हर प्रेयसी प्रियतमा नाज से साथ आये जिसमे
पिता का स्वाभमानी सर न झुके जिससे
बहन की आँख न झुके जिससे
कदम भाई का न रुके जिसमे
दोस्त बेधडक आगे बढ़ते मिले जिसमे
" --विजयलक्ष्मी 

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