Wednesday, 15 October 2014

" अनुवाद भाषा का या आशा का "

सन्नाटा कयामत बनकर गहर जाए 
जिन्दगी की हर आहत सी आहट संवर जाये 
कुछ शिलालेख उभरते है धडकन की तर्ज बनकर 
जीवन संस्कृति महकती है उसी क्षण 
खुशबू से महक कदम बहकते क्यूँ है 
मेरे होश बेहोश होते क्यूँ है
स्वर उठते है क्यूँ गहरा के तुम्हारे मेरे परित:
कौन सा सेतु है जो टूटकर भी टूटा
कोई किनारा दुसरे छोर जुदा सा रहता है कही
बह उठती है नदी लहरों पर ख्वाब सम्भाले हुए
बस व्ही इक अहसास चांदनी लिए फिरती है रातो को
चाँद बदली में छिप गया ..और मैं तन्हा अकेले
निद्रा के डेरे घेरे हुए कुछ अनुनाद करती होगी
सुन पाओ तो बताना मुझको
अनुवाद भाषा का या आशा का .. यादों का ह्रदय में उगते सम्वादों का
वही राह ..वहीं चौखट वहीं नजर दरवाजे पर टिकी
------ विजयलक्ष्मी 

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