Thursday, 30 October 2014

" ................. अन्यथा अकविता समझ लेना .."

" कविता भूखे किसान का क्रन्दन भी है 
कविता माँ भारती का वन्दन भी है 
कविता देश-प्रेम का चन्दन भी है 
कविता आगत का अभिनन्दन भी है 
कविता जिन्दगी और मृत्यु का अटूट बंधन भी है 
कविता यदि नैसर्गिक है तो कविता है अन्यथा अकविता समझ लेना
जिसमे अहसास शब्दकोश से उतारे जाते है
बड़े बड़े भारी भारी शब्द उकेरे जाते है
जिन्हें साहित्य के शिखर की तमन्ना है वही लिख पाते हैं
हम जैसे तो साँस के साथ गुनगुनाते हुए जीवन को भी नहीं कह पाते है
माँ की आँखों में ममता तो होती है डर भी होता है
माँ पत्थर सी दिखती जरूर है उसमे एक दिल भी होता है
वो माँ भारती हो या बच्चे की माँ ...
उसका हर गुजरता लम्हा कविता होता है
जब वो बिक जाती है बच्चे के दूध की खातिर
या मार डालती है बिटिया की इज्जत की खातिर
कविता तो जिन्दगी है जिन्दगी के साथ बहती है
कविता न निरपेक्ष न सापेक्ष बस कविता ही रहती है
"---- विजयलक्ष्मी 

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