Thursday, 24 July 2014

" सुलगते जज्बात भीगी अगरबत्ती से "

"आवाज तो दबकर रह गयी शोर में ,
मगर देशराग गूंजता है नफस नफस ||

चिरैया को कैद कर सैयाद खुश हुआ 
तोता तो कैद में बैठा कफस कफस ||

कटते हुए जंगल परेशां इंसान क्यूँ 
खाली खोपड़ी की कौन हवस हवस ||

उडती तश्तरी तेरे शहर की तलाश में 
कब्र में भी जिन्दा बैठे तरस तरस ||

सुलगते जज्बात भीगी अगरबत्ती से 
गिरते रहे हम बादलों से बरस बरस || "---- विजयलक्ष्मी 

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