Monday, 14 July 2014

"ये सच जानती हूँ ...तुम कोलम्बस जो ठहरे .."

तुम जीत का जश्न मनाओ ,
सुनो , मेरी हार पर खुश हो न 
मगर ..याद रखना इक छोटा सा सच ,,
तुम जीते क्यूंकि मैंने हार स्वीकार कर ली 
अन्यथा ...जूझते रहते आजतक भी मुझसे 
और ..मुझे युद्ध नहीं चाहिए तुम्हारे साथ ..
तुम्हारा साथ चाहिए ,,
जिदगी के युद्ध में ,,
जश्न मनाओ 
बहुत खुश हूँ मैं भी तुम्हारी हर जीत पर 
मगर ...याद रखना इक छोटा सा सच ,,
मैं कमजोर नहीं हूँ
हारा हुआ कमजोर या दया का पात्र नहीं होता
हकीकत में सम्मान का हकदार है वो
मुझमे तुम्हारी जीत स्वीकारने की हिम्मत है
मुझे खुद को झुकाना भी आता है
अन्यथा ...याद रखना मैं टूट भी सकती थी
मगर ...मैं टूती नहीं हूँ
क्यूंकि टूटकर मर जाती ..
तुम्हे पहली बधाई कौन देता
तुम्हे जिन्दा रहने का वो प्रथम अहसास कौन कराता
मगर ...याद रखना मीठा खाने की सीमा होती है ,
लेकिन ...नमक ,,जरूरी अहर्ताए हैं उसके पास ,,
ऊब जाओगे जिस दिन ...मैं हूँ न खार लिए ,
सतत साथ ...ज्यूँ नदिया संग किनारे चले
जीवन का चुभता हुआ सत्य लिए हूँ .
याद रखो ये सत्य ..रंज का शूल साथ लिए हूँ ,,
बोलना जरूरी नहीं है.... उपजने दो अंतर्मन में स्वत:
गंगा का आगमन या उसमे आचमन ,,
धन्य हुए दुर्लभ दर्शन पाकर
यक्ष प्रश्न ..मैं कौन हूँ ?...प्रश्न अप्रतिम है ...बिम्बित करना चाहती हूँ स्वरूप ..
पगले हो क्या ...आत्माओं का स्वरूप कही देखा है कभी
रगं और आकार होता ही कब है..
क्या ढूँढू ,,क्यूँ ढूँढू किसके लिए भला ,,
मेरी तलाश ...अनुसन्धान....विज्ञानं
जब पूरी होगी ..जान जाओगे मुझसे पहले तुम
ये सच जानती हूँ ...तुम कोलम्बस जो ठहरे
मगर ...याद रखना यद्यपि मैं भागीरथ भी नहीं हूँ
लेकिन ...गंगा में उतरने वाली प्रथम मैं ही हूँ शायद
और ..एक सत्य यह की डूबने वाली अंतिम ईकाई ---- विजयलक्ष्मी

No comments:

Post a comment